कानकुन में प्रतिबद्धता रहित समझौता, भारतीय हित 'सुरक्षित' (राउंडअप)

कानकुन, 11 दिसम्बर (आईएएनएस)। संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन में शनिवार को 193 देश कानकुन समझौते पर सहमत हो गए, लेकिन इस समझौते में क्योटो प्रोटोकाल की अवधि समाप्त हो जाने के बाद विकसित देश कितनी मात्रा में कार्बन के उत्सर्जन में कटौती करेंगे, इस बात का कोई जिक्र नहीं है।

क्योटो प्रोटोकाल की अवधि वर्ष 2012 में समाप्त हो रही है और वर्तमान में जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए एक यही कानूनी रूप से बाध्यकारी समझौता है। कानकुन में हुए समझौते में किसी दूसरे बाध्यकारी समझौते के बारे में कुछ नहीं कहा गया है। देशों ने इस बारे में केवल बातचीत करने का निर्णय लिया है।

पिछले वर्ष कोपेनहेगेन सम्मेलन के बाद मेक्सिको में 29 नवंबर से 10 दिसम्बर तक चले इस सम्मेलन में 194 देशों ने भाग लिया। इस दौरान कार्बन उत्सर्जन में कटौती को लेकर देशों के बीच काफी उठापठक चली। इस दौरान भारत ने अपनी चिंताओं के बीच एक मसौदा भी रखा।

पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने घोषणा किया, "कानकुन समझौते में भारतीय हितों की पूरी तरह से रक्षा और उसे आगे बढ़ाया गया है।"

उधर, भारत का विज्ञान एवं पर्यावरण केंद्र (सीएसई) समझौते और इसमें भारत की स्थिति पर असंतोष जाहिर किया है।

सीएसई के एक प्रवक्ता ने कहा, "जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए समझौता कारगर नहीं है। समझौते में वर्ष 2050 के लिए कार्बन उत्सर्जन में कटौती का कोई वैश्विक लक्ष्य नहीं है।"

प्रवक्ता के मुताबिक समझौते में कार्बन उत्सर्जन में कटौती करने के लिए कोई समान्य प्रक्रिया या तरीके के बारे में कोई उल्लेख नहीं किया गया है। इससे भारत के विकास में अवरोध उत्पन्न होगा।

उधर, रमेश ने जोर देकर कहा है कि भारत का विकास करने का अधिकार पूरी तरह सुरक्षित है। उन्होंने कहा कि भारत को विकास से रोकने वाले उपबंध को समझौते से हटा दिया गया है।

रमेश ने कहा, "बेसिक के देशों ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, भारत और चीन इस समझौते से खुश हैं।"

दो महीने तक चली वार्ता के बाद कानकुन में 29 नवंबर से 10 दिसम्बर तक चले 'यूएन फ्रेमवर्क कंवेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज' सम्मेलन विवाद के साथ खत्म हुआ। समझौते का विरोध बोलीविया ने किया। बोलीविया के प्रमुख वार्ताकार पाब्लो सोलोन ने कहा, "इस समझौते से जलवायु परिवर्तन को नहीं रोका जा सकता।"

कार्बन उत्सर्जन को लेकर शुक्रवार को चले उठापठक के बीच बोलिविया को छोड़कर अन्य देश यूएनएफसीसीसी के कार्यकारी सचिव क्रिस्टीयाना फिग्यूरेस द्वारा पेश 'एक संतुलित पैकेज' पर सहमत हुए।

बोलिविया का कहना है कि समझौता ग्लोबल वार्मिग का सामना करने के लिहाज से कमजोर है। उसका कहना है कि करारनामे की स्वीकृति संयुक्त राष्ट्र के उस नियम के उल्लंघन का द्योतक है, जिसके तहत समझौते पर सम्मेलन के सभी 194 सदस्यों का समर्थन आवश्यक है।

बोलिविया के प्रतिनिधिमंडल के प्रमुख पाब्लो सैलोन ने कहा, "हमने स्पष्ट रूप से अपनी बात कही और अब भी उसे दोहराते हैं कि हम इस फैसले के विरोध में हैं। हम महसूस करते हैं कि स्वीकृति के लिए आमराय नहीं ली गई।"

सम्मेलन की अध्यक्षता करने वाली मेक्सिको की विदेश मंत्री पैक्ट्रिसिया एस्पिनोसा ने बोलिविया की दलील को दरकिनार करते हुए समझौते को स्वीकृत किया। लेकिन जो खुशी का माहौल होना चाहिए, वह इस कारण नहीं बन सका, क्योंकि बोलिविया की आपत्ति ने सभी देशों की सरकारों के बीच सहमति बनाने के लिए लगभग दो हफ्ते तक की गई कड़ी मशक्कत को नकार दिया।

मसौदे में गरीब देशों की मदद के लिए 'ग्लोबल क्लाइमेंट फंड' बनाने की बात कही गई है। इस निधि से 2020 तक 100 अरब डॉलर जुटाकर गरीब देशों को दिए जाएंगे ताकि वे जलवायु परिवर्तन के नतीजों से निपट सकें और कम कार्बन उत्सर्जन की ओर बढ़ सकें।

सम्मेलन में देश पेड़ों की कटाई रोकने और गरीब देशों को ग्रीन प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण के मुद्दे पर भी आगे बढ़े, जबकि पेटेंट प्रौद्योगिकी के मुद्दे को बातचीत में शामिल नहीं किया गया।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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