कानकुन में जलवायु परिवर्तन पर समझौता (लीड-1)
समझौते के मसौदे में इस बात का जिक्र नहीं है कि वर्ष 2012 में समाप्त हो रहे क्योटो प्रोटोकाल के बाद विकसित देश कार्बन उत्सर्जन में कितनी मात्रा की कटौती करेंगे। इसके अलावा मसौदे में जलवायु परविर्तन की चुनौतियों से निपटने वाले दूसरे बाध्यकारी कानून के बारे में भी कोई उल्लेख नहीं किया गया है।
इस मसौदे पर पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने कहा, "कानकुन समझौते में भारत के हितों को पूरी तरह से संरक्षित और उसे आगे बढ़ाया गया है।"
उधर, कानकुन में 193 देशों के बीच हुई सहमति पर असंतोष व्यक्त करते हुए भारत में विज्ञान एवं पर्यावरण केंद्र (सीएसई) के एक प्रवक्ता ने कहा, "जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए समझौता कारगर नहीं है। समझौते में वर्ष 2050 के लिए कार्बन उत्सर्जन में कटौती का कोई वैश्विक लक्ष्य नहीं है। यहां तक कि विकसित देशों के लिए इसमें कटौती के लिए कोई लक्ष्य नहीं रखा गया है।"
रमेश ने कहा, "बेसिक के देशों ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, भारत और चीन इस समझौते से खुश हैं।"
दो महीने तक चली वार्ता के बाद कानकुन में 29 नवंबर से 10 दिसम्बर तक चले 'यूएन फ्रेमवर्क कंवेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज' सम्मेलन विवाद के साथ खत्म हुआ। समझौते का विरोध बोलीविया ने किया। बोलीविया के प्रमुख वार्ताकार पाब्लो सोलोन ने कहा, "इस समझौते से जलवायु परिवर्तन को नहीं रोका जा सकता।"
कार्बन उत्सर्जन को लेकर शुक्रवार को चले उठापठक के बीच बोलिविया को छोड़कर अन्य देश यूएनएफसीसीसी के कार्यकारी सचिव क्रिस्टीयाना फिग्यूरेस द्वारा पेश 'एक संतुलित पैकेज' पर सहमत हुए।
बोलिविया का कहना है कि समझौता ग्लोबल वार्मिग का सामना करने के लिहाज से कमजोर है। उसका कहना है कि करारनामे की स्वीकृति संयुक्त राष्ट्र के उस नियम के उल्लंघन का द्योतक है, जिसके तहत समझौते पर सम्मेलन के सभी 194 सदस्यों का समर्थन आवश्यक है।
बोलिविया के प्रतिनिधिमंडल के प्रमुख पाब्लो सैलोन ने कहा, "हमने स्पष्ट रूप से अपनी बात कही और अब भी उसे दोहराते हैं कि हम इस फैसले के विरोध में हैं। हम महसूस करते हैं कि स्वीकृति के लिए आमराय नहीं ली गई।"
सम्मेलन की अध्यक्षता करने वाली मेक्सिको की विदेश मंत्री पैक्ट्रिसिया एस्पिनोसा ने बोलिविया की दलील को दरकिनार करते हुए समझौते को स्वीकृत किया। लेकिन जो खुशी का माहौल होना चाहिए, वह इस कारण नहीं बन सका, क्योंकि बोलिविया की आपत्ति ने सभी देशों की सरकारों के बीच सहमति बनाने के लिए लगभग दो हफ्ते तक की गई कड़ी मशक्कत को नकार दिया।
मसौदे में गरीब देशों की मदद के लिए 'ग्लोबल क्लाइमेंट फंड' बनाने की बात कही गई है। इस निधि से 2020 तक 100 अरब डॉलर जुटाकर गरीब देशों को दिए जाएंगे ताकि वे जलवायु परिवर्तन के नतीजों से निपट सकें और कम कार्बन उत्सर्जन की ओर बढ़ सकें।
सम्मेलन में देश पेड़ों की कटाई रोकने और गरीब देशों को ग्रीन प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण के मुद्दे पर भी आगे बढ़े, जबकि पेटेंट प्रौद्योगिकी के मुद्दे को बातचीत में शामिल नहीं किया गया।
मेक्सिको के राष्ट्रपति फिलिप काल्डेरोन ने समझौते पर सहमति के बाद कहा, "विश्वास लौटा है। उम्मीद लौट आई है।" उन्होंने कहा कि कानकुन सम्मेलन 'जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में सहयोग के नए युग' का परिचायक है।
समझौते में क्योटो प्रोटोकॉल के भविष्य पर बड़े मतभेदों को ध्यान में रखते हुए मध्यमार्ग अपनाया गया। साथ ही मुद्दा रखा गया कि ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन से कैसे निबटा जाए। इस मुद्दे को नहीं उठाने पर समूचे सम्मेलन के पटरी से उतरने की आशंका थी।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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