अब 100 मिनट में हो सकेगी तपेदिक की पहचान

डब्ल्यूएचओ के 'स्टॉप टीबी' विभाग के निदेशक मारियो रैविग्लियोन कहते हैं, "यह नई जांच तपेदिक की वैश्विक स्तर पर पहचान करने और उसके इलाज की दिशा में एक बड़ा मील का पत्थर साबित होगी। यह जांच तपेदिक के खतरे और दवाओं की प्रतिरोधकता सम्बंधी बीमारियों के इलाज की दिशा में उम्मीद की नई किरण है।"

तपेदिक के वैश्विक बोझ का एक तिहाई हिस्सा भारत पर है। दुनिया में सबसे ज्यादा तपेदिक मरीज भारत में है। वर्ष 2009 में इसके करीब 20 लाख मामले सामने आए थे।

वर्तमान में जिस जांच का इस्तेमाल होता है वह करीब एक दशक पहले विकसित हुई थी। इसमें मरीज के थूक की माइक्रोस्कोप से जांच की जाती है। इसके परिणाम जानने में करीब तीन महीने का समय लगता है।

नई जांच 'न्यूक्लिक एसिड एम्प्लीफिकेशन टेस्ट' (एनएएटी) को 18 महीने के परीक्षण के बाद स्वीकृति मिली है। एनएएटी के जरिए तपेदिक की जल्द पहचान हो सकती है। इसके साथ ही इसके जरिए कई दवाओं के प्रति प्रतिरोधी तपेदिक (एमडीआर-टीबी) और एचआईवी संक्रमण से जटिल हुई तपेदिक की भी पहचान हो सकती है जबकि वैसे यह मुश्किल होता है।

एनएएटी में आधुनिक डीएन प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल होता है। डब्ल्यूएचओ ने इसके सकारात्मक परिणामों के लिए इसके इस्तेमाल सम्बंधी कुछ नियम जारी किए हैं।

डब्ल्यूएचओ के मुताबिक भारत में तपेदिक से हर साल करीब 500,000 लोग, प्रतिदिन 1,000 से ज्यादा और प्रत्येक मिनट एक व्यक्ति की मौत होती है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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