जलवायु परिवर्तन: विपक्ष ने बदले रुख पर सरकार से स्पष्टीकरण मांगा

जयराम रमेश ने सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए सभी देशों को 'उचित कानूनी बाध्यकारी प्रतिबद्धता' सुनिश्चित करने का प्रस्ताव रखा था। यह परिवर्तन भारत की जलवायु परिवर्तन नीति में बड़ा बदलाव माना जा रहा है। नए प्रस्ताव से संकेत मिलता है कि भारत कार्बन उत्सर्जन में कमी के लिए बाध्यकारी प्रतिबद्धता स्वीकार करने की ओर बढ़ रहा है।

रमेश पर संसद द्वारा निर्धारित नीतिगत सीमाएं लांघने का आरोप लगाते हुए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और वामदलों ने सरकार से जयराम रमेश के कानकुन में दिए गए बयान पर स्पष्टीकरण देने की मांग की है।

भाजपा प्रवक्ता तरुण विजय ने कहा, "जयराम रमेश ने जो यहां कहा वह अलग था और कानकुन में जो कहा वह अलग है। वह हर बार बयान बदल रहे हैं। इससे देश के हितों को नुकसान होगा और जिस रास्ते को वह अपना रहे हैं वह स्वयं हार मान लेने जैसा है।"

मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) की नेता वृंदा करात ने कहा, "जयराम रमेश के नेतृत्व में कानकुन में मौजूद भारतीय शिष्ट मंडल अमेरिका के नेतृत्व वाले विकसित देशों के दबाव में झुक गया है और इसके चलते उसने कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए कानूनी बाध्यतापूर्ण सीमाएं लागू करने की बात स्वीकार की है। यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। हम इसकी निंदा करते हैं और सरकार से मांग करते हैं कि वह इस पर स्पष्टीकरण दे।"

वहीं जयराम रमेश ने अपना बचाव करते हुए कहा कि, "मेरे पास छुपाने के लिए कुछ नहीं है। सब कुछ पूरी पारदर्शिता के साथ किया गया है। यह रुख भारत की स्थिति को मजबूत करने के लिए अपनाया गया है। कानकुन में भारत ने ज्यादा सक्रिय भूमिका निभाई है।"

जयराम ने कहा, "यह बेहद महत्वपूर्ण है कि हम बाकी विश्व से अलग न रहें। 25 साल पहले की तुलना में अब विश्व अर्थव्यवस्था में हमारी बड़ी भागीदारी है। वार्ता का मतलब लचीलापन ही होता है। मैनें लक्ष्य नहीं बदला है, यह केवल देखने का नजरिया है। हम मौजूदा स्थिति में कानूनी बाध्यता समझौता नहीं कर रहे हैं और मुझे इस बात की जानकारी नहीं है कि इस समझौते की विषयवस्तु, जुर्माना या निगरानी तंत्र क्या होगा।"

सम्मेलन में बुधवार शाम को रमेश ने कहा था, "जलवायु परिवर्तन का कारण बन रहीं ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन कम करने के लिए सभी देशों को उचित कानूनी रूप में बाध्यकारी प्रतिबद्धता सुनिश्चित करनी चाहिए।"

जलवायु परिवर्तन पर पिछले 17 वर्ष से जारी वार्ता में भारत का यह प्रस्ताव अब तक का सबसे महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है। भारत ने इस मुद्दे पर विकासशील देशों का नेतृत्व किया है। विकासशील देशों का रुख रहा है कि जलवायु परिवर्तन की समस्या का कारण धनी देश हैं और उन्हें अपने ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी करनी चाहिए।

अमेरिका एकमात्र ऐसा विकसित देश है जिसने कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए अब तक की एक मात्र वैश्विक संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। अमेरिका का स्पष्ट रुख रहा है कि वह किसी भी तरह का कानूनी बाध्यकारी समझौता तब तक नहीं करेगा जब तक कि भारत और चीन ऐसा नहीं करते।

बड़े विकासशील देशों ने अमेरिका के इस रुख का लगातार विरोध किया है जिसके चलते जलवायु परिवर्तन पर वार्ता बाधित रही है। भारत ने पिछले साल कोपेनहेगन सम्मेलन में अपने रुख में परिवर्तन लाते हुए अपने कार्बन उत्सर्जन में 2020 तक 2005 की तुलना में 20-25 प्रतिशत तक कमी करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की थी।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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