कानकुन में रमेश के प्रस्ताव पर भारत में असंतोष (लीड-1)
कानकुन, 9 दिसम्बर (आईएएनएस)। कानकुन में चल रहे जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश द्वारा दिए गए 'उचित कानूनी बाध्यकारी प्रतिबद्धता' प्रस्ताव पर भारत में विरोध शुरू हो गया है। पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि इससे विकसित और विकासशील देशों के बीच कार्बन उत्सर्जन में कटौती का अंतर समाप्त हो जाएगा।
कानकुन में चल रहे 29 नवंबर से 10 दिसम्बर तक के संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में उपजे गतिरोध को तोड़ने के लिए पर्यावरण मंत्री ने सम्मेलन के सदस्यों के बीच अपना प्रस्ताव रखा। उन्होंने कहा, "यह प्रस्ताव भारत को विश्व में एक ईमानदार मध्यस्थ के रूप में स्थापित करेगा"
रमेश ने बुधवार शाम यहां सम्मेलन के उच्च स्तरीय सत्र को संबोधित करते हुए कहा कि कार्बन उत्सर्जन पर नियंत्रण के लिए 'सभी देशों को उचित कानूनी प्रावधानों के तहत बाध्यकारी प्रतिबद्धताएं रखनी चाहिए।'
रमेश का यह बयान गत 17 वर्षो से कार्बन उत्सर्जन पर भारत के रुख से अलग है। जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर विकासशील देशों का नेतृत्व करने वाला भारत का मानना है कि जलवायु परिवर्तन की समस्या विकसित देशों की वजह से बनी है।
भारत का मानना है कि विकसित देशों ने कई वर्षो से कार्बन का उत्सर्जन किया है। इसलिए उनकी जिम्मेदारी बनती है कि वे इसमें कटौती करें, जबकि विकासशील देशों को अभी कार्बन उत्सर्जन करने का अधिकार बनता है।
रमेश ने स्वीकार किया है कि उन्होंने यह प्रस्ताव विकसित देशों से पड़ने वाले दबाव के चलते दिया है। पर्यावरण मंत्री 'एसोसिएशन ऑफ स्माल आइजलैंड स्टेट्स' (एओएसआईएस) की ओर से तैयार एक प्रस्ताव पर प्रतिक्रिया दे रहे थे। प्रस्ताव में सभी देशों को अपने कार्बन उत्सर्जन पर नियंत्रण के लिए एक कानूनी रूप से बाध्यकारी संधि पर हस्ताक्षर करने के लिए कहा गया है।
रमेश ने पत्रकारों से कहा, "संधि का अनुपालन न करने पर दंड की व्यवस्था और इसे लागू करने एवं निगरानी करने के लिए एक व्यवस्था का उल्लेख समझौते में स्पष्ट रूप से होना चाहिए, ऐसा न होने पर हम इस मुद्दे पर चर्चा नहीं करेंगे।"
उधर, भारत में विज्ञान एवं पर्यावरण केंद्र (सीएसई) ने पर्यावरण मंत्री के प्रस्ताव को दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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