जलवायु परिवर्तन पर पुराने झगड़ों से नई उपलब्धियों को खतरा
जॉयदीप गुप्ता
कानकुन (मेक्सिको), 6 दिसम्बर (आईएएनएस)। औद्योगीकृत और विकासशील देशों के बीच पुराने झगड़ों के कारण ग्लोबल वार्मिग से निपटने की कोशिश में हासिल की जाने वाली नई उपलब्धियों के पटरी से उतरने का खतरा पैदा हो गया है। यह स्थिति तब है, जब संयुक्त राष्ट्र का वार्षिक जलवायु सम्मेलन अपने अंतिम सप्ताह में प्रवेश कर गया है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, वनों का क्षरण रोकने और विकासशील देशों को हरित प्रौद्योगिकी मुहैया कराने के तरीकों पर पिछले सप्ताह कानकुन में महत्वपूर्ण प्रगति हुई।
जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने में गरीब देशों की मदद के लिए एक कोष की स्थापना करने को लेकर भी कुछ प्रगति हुई, यद्यपि कोष के पास फिहलाल कोई पैसा नहीं है, और ये देश पहले से ही कृषि उत्पादों में गिरावट, बार-बार के गम्भीर सूखे, बाढ़, तूफान और समुद्र के जलस्तर में वृद्धि जैसी समस्याओं का सामना कर रहे हैं।
लेकिन प्रमुख औद्योगीकृत देश इस बात की घोषणा कर रहे हैं कि वे क्योटो प्रोटोकॉल के तहत 2012 के बाद ग्रीनहाउस गैस (जीएचजी) का अपना उत्सर्जन नहीं घटाएंगे, जबकि विकासशील देश इस बात पर अड़े हुए हैं। पैदा हुए इस गतिरोध के कारण यहां जुटे 192 देशों के प्रतिनिधियों में इस बात का भय पैदा होने लगा है कि इस मुद्दे पर हुई सभी प्रगति एक बार फिर अवरुद्ध हो जाएगी, जैसा कि पिछले वर्ष कोपेनहेगन शिखर सम्मेलन में हुआ था।
पर्यावरण मंत्री, जयराम रमेश ने बीएएसआईसी (ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, भारत, चीन) देशों के पर्यावरण मंत्रियों से यहां रविवार को मुलाकात की थी और उसके बाद आईएएनएस को बताया था कि इस समूह की "तीन ऐसी शर्तें हैं, जिनके साथ कोई समझौता नहीं किया जा सकता। पहला यह कि क्योटो प्रोटोकाल के तहत दूसरी प्रतिबद्धता अवधि (2012 के बाद) पर एक स्पष्ट और निरपेक्ष बयान हो, दूसरा यह कि 2011 के मध्य तक अच्छे दर्जे की वित्तीय सहायता का भुगतान शुरू किया जाए, और बौद्धिक सम्पदा अधिकार (आईपीआर) पर बातचीत को चालू रखने की कोई कार्यपद्धति तैयार की जाए। हमें पता है कि हम यहां उस समस्या का समाधान नहीं कर पाएंगे, लेकिन हमे इस पर चर्चा जारी रखने की आवश्यकता है।"
रमेश ने दूसरी बात यह कही थी कि धनी देशों ने कोपेनहेगन में किए अपने प्रमुख वादे का पूरी तरह पालन नहीं किया। वादे के तहत गरीब देशों को जलवायु परिवर्तन से निपटने में मदद करने के लिए 2010 और 2012 के बीच 30 अरब डॉलर की धन राशि मुहैया करानी थी। रमेश ने यहां पहुंचने के तत्काल बाद अपनी नाराजगी जाहिर कर दी थी, क्योंकि अमेरिका ने अभी तक मात्र 1.8 अरब डॉलर की राशि का ही वादा किया है। यूरोपीय संघ ने तीन वर्षो के दौरान 7.2 अरब यूरो देने का वादा किया है, लेकिन उसका 48 प्रतिशत हिस्सा ऋण के रूप में होगा। हालांकि यूरोपीय संघ के जलवायु प्रमुख कोन्नी हेडेगार्ड ने स्पष्ट किया कि यह राशि एक प्रतिशत के रियायती ब्याज दर पर उपलब्ध कराई जाएगी। लेकिन यह सारी कवायद फिर भी गरीब देशों की सरकारों को लुभा पाने में नाकामयाब साबित हुई है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


Click it and Unblock the Notifications