अफ़्रीका बन सकता है अन्न का कटोरा

अफ़्रीकी देशों की छवि आमतौर पर एक ऐसे इलाक़े की रही है जहाँ अन्न की कमी है और उसे बाक़ी देशों से खाद्य सामग्री माँगनी पड़ती है.
लेकिन एक नई किताब में दावा किया गया है कि अगले कुछ वर्षों में अफ़्रीका अपने लोगों का पेट ख़ुद भरने के काबिल बन सकता है और कृषि उत्पादों का बड़ा निर्यातक बनने की क्षमता रखता है.
‘द न्यू हार्वेस्ट’ नाम की ये किताब हार्वड यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर केलस्टस जुमा ने लिखी है.
इसमें कहा गया है कि अफ़्रीकी नेताओं को कृषि क्षेत्र को अपनी पहली प्राथमिकता बनाना चाहिए और आधुनिकीकरण को अपनाना चाहिए.
बीबीसी संवाददाता नील बाउडलर के मुताबिक प्रोफ़ेसर जुमा की सोच शायद ग़लत नहीं है.
प्रोफ़ेसर जुमा मानते हैं कि अफ़्रीका में ज़मीन और काम करने वाले लोगों की कमी नहीं है और इसलिए अफ़्रीका को अन्न का आयातक नहीं बल्कि एक बड़ा निर्यातक होना चाहिए.
उनकी मानें तो ऐसा मुमकिन है..ज़रूरत है तो बस राजनीतिक इच्छाशक्ति की.यही संदेश लेकर वे तंज़ानिया जा रहे हैं जहाँ अफ़्रीकी नेताओं का सम्मेलन हो रहा है.
रा जनीतिक इच्छाशक्ति की ज़रूरत
प्रोफ़ेसर जुमा का तर्क है कि नेता कोई भी फ़ैसला लें उसमें अन्न की उपलब्धता बड़ा मुद्दा होना चाहिए.
प्रोफ़ेसर जुमा की इच्छा-सूची काफ़ी लंबी है. इसमें सड़क निर्माण, सिंचाई और ऊर्जा योजनाओं में निवेश की बात शामिल है. साथ ही वे कहते हैं कि सभी खेतों में मशीन से काम हो और खाद्य सामग्री को रखने और प्रोसेसिंग की सुविधा होनी चाहिए.
उनका कहना है कि अफ़्रीकी महाद्वीप को विज्ञान को अपनाना होगा जिसमें जीन संवर्धित फ़सलों का इस्तेमाल शामिल है ताकि जलवायु परिवर्तन से निपटा जा सके.
वे कहते हैं, “ज़्यादातर अफ़्रीकी देश फ़िलहाल कृषि पर अपने धन का बहुत छोटा हिस्सा खर्च करते हैं जबकि अफ़्रीकी देशों के करीब 70 फ़ीसदी लोग कृषि संबंधी कामों से जुड़े हुए हैं. यहाँ खेतों में ट्रेक्टर और खाद बाक़ी देशों के मुकाबले कम इस्तेमाल होते हैं.”
वैसे अफ़्रीका में कुछ देश ऐसे भी हैं जिन्होंने कृषि क्षेत्र में औरों की तुलना में सफलता हासिल की है. घाना ने सीमित संसाधनों के बावजूद कृषि क्षेत्र में अच्छा काम किया है.
लेकिन इस सफलता को ऐसे देशों में दोहराना बड़ी चुनौती होगी जो भूख, राजनीतिक अस्थिरता और जलवायु परिवर्तन के नतीजों से जूझ रहे हैं.


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