भोपाल गैस त्रासदी : 'पोस्टर लेडी' को ही नहीं माना गैस पीड़ित

भोपाल, 2 दिसंबर (आईएएनएस)। भोपाल में 26 वर्ष पहले हुई दुनिया की भीषणतम गैस त्रासदी को बयां करने वाले पोस्टर में जिस महिला की तस्वीर छपी थी, उसे गैस पीड़ित नहीं माना गया है और इसलिए वह मुआवजे से वंचित कर दी गई।

गैस त्रासदी और उसके बाद के संघर्ष को दो तस्वीरें बयां करती हैं, जिनमें से एक उस अनाम बच्चे की है, जिसका चेहरा पत्थरों से घिरा नजर आता है और दूसरी चश्मे वाली बुजुर्ग मकसूदा बेगम की। चौंकाने वाला तथ्य यह है कि इस पोस्टर लेडी को न तो गैस पीड़ित माना गया है और न ही उसे मुआवजा हासिल हो सका है।

मकसूदा बेगम गैस पीड़ितों के संघर्ष का वह चेहरा है जो अंदोलनों के दौरान नजर आने वाले पोस्टरों पर साफ तौर पर दिख जाता है। संघर्ष की पहचान बन चुकी सेठीनगर निवासी 80 वर्षीय मकसूदा बेगम का चेहरा झुर्रियों से ढक गया है और उसकी आंखों की रोशनी मद्धिम पड़ गई है, मगर अपने हक की लड़ाई लड़ने का उसका जज्बा कम नहीं हुआ है।

वह पिछले 26 वर्षो से अपने हक की लड़ाई रही है, मगर उसे अब तक मुआवजा मिलना तो दूर, गैस पीड़ित ही नहीं माना गया है। उनके पति सईद अख्तर और बेटे शमीम अख्तर तथा बहू अमरजहां को तो गैस पीड़ित का मुआवजा मिला चुका है, मगर इस 'पोस्टर लेडी' की संघर्ष यात्रा जारी है।

मकसूदा बताती हैं कि उन्होंने भोपाल गैस पीड़ित महिला उद्योग संगठन के बैनर तले सैकड़ों बार भोपाल और दिल्ली में आयोजित आंदोलन में हिस्सा लिया है। उनके पास वे तमाम कागजात भी हैं जो उसे गैस पीड़ित साबित करने के लिए काफी है। मकसूदा का बेटा शमीम अख्तर बताते हैं कि गैस राहत आयुक्त के कार्यालय से फाइल गायब हुए वर्षो बीत गए हैं, मगर आयुक्त कार्यालय अपनी गलती मानने को तैयार नहीं है और दूसरी फाइल बनाने को भी राजी नहीं है। यही वजह है कि 26 साल बाद भी उन्हें गैस पीड़ित नहीं माना गया है।

भोपाल में दो-तीन दिसंबर, 1984 की दरम्यानी रात यूनियन कार्बाइड संयंत्र से रिसी जहरीली गैस का मंजर याद दिलाने पर 80 वर्षीय मकसूदा सिहर उठती है। वह बताती है कि उस रात सिर्फ 'भागो-भागो' की आवाज के बीच लोगों की चीखें सुनाई दे रहीं थीं। ये चीखें बुजुर्ग, युवा और बच्चों की भी थीं। जिसे देखो, वही बदहवास होकर भागे जा रहा था। कोई यह तक बताने के लिए तैयार नहीं था कि क्या हुआ है। इस हाल में मकसूदा भी अपनी गर्भवती बहू और बेटे के साथ इंद्रपुरी की ओर भागी। उसे बाद में पता चला कि यूनियन कार्बाइड कारखाने से गैस रिसने के कारण यह हादसा हुआ है।

हादसे का एक दिन गुजर जाने के बाद भी उसे इस बात का अंदाजा नहीं था कि यह हादसा कितना वीभत्स था। उनके दामाद मोहम्मद गौस ने जब उन्हें इलाज के बहाने रेलवे स्टेशन ले गए तो वहां का मंजर देखकर उनकी रूह कांप गई। वह बताती हैं कि मालगाड़ी में शव पड़े थे और जहां देखो वहां शव ही शव नजर आ रहे थे।

मकसूदा को अफसोस इस बात का है कि सरकारी मशीनरी ने उनके दर्द को नहीं समझा और उसे पीड़ित तक नहीं माना। उनका आरोप है कि मुआवजा बांटने में जमकर धांधली हुई है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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