चीन का कोरिया पर आपात बैठक का प्रस्ताव

चीन का कोरिया पर आपात बैठक का प्रस्ताव

चीन ने उत्तर और दक्षिण कोरिया में तनाव कम करने के लिए छह देशों की आपात बैठक बुलाने की माँग की है. हालांकि दो देशों दक्षिण कोरिया और जापान की बेहद ठंडी प्रतिक्रिया सामने आई है.

चीन का कहना है कि वो हाल की घटनाओं से चिंतित है और चाहता है कि दिसंबर की शुरुआत में छह देशों के कूटनयिक उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रमों के बारे में चर्चा करें.

दक्षिण कोरिया ने कहा है कि वो फ़ैसला लेने से पहले अन्य देशों से बात करेगा जबकि जापान ने इस बारे में कोई वादा नहीं किया है.

छह देशों की इस बातचीत में उत्तर और दक्षिण कोरिया के अलावा अमरीका, रूस, जापान और चीन शामिल होंगे.

ग़ौरतलब है कि कोरियाई प्रायद्वीप में भीषण तनाव के बीच अमरीका और दक्षिण कोरिया ने कई दिनों तक चलने वाला संयुक्त सैन्य अभ्यास शुरु कर दिया है.

कोरियाई प्रायद्वीप में उत्तर कोरिया के तोपों से गोलाबारी करने और दक्षिण कोरिया के जवाबी कार्रवाई करने के बाद से ख़ासा तनाव है.

ये सैन्य अभ्यास विवादित सीमाक्षेत्र से लगभग 125 किलोमीटर दक्षिण में हो रहे हैं.

उत्तर कोरिया ने कहा है कि संयुक्त सैन्य परीक्षण अमरीका और दक्षिण कोरिया की ओर से उकसाने वाला क़दम है जिसके परिणामों के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता.

उत्तर कोरिया की सरकारी समाचार एजेंसी केसीएनए ने कहा है, "यदि अमरीका अपना युद्धपोत कोरिया के पश्चिमी समुद्र (यलो सी) की ओर लाता है, तो कोई नहीं कह सकता कि इसका क्या परिणाम होगा."

'गनबोट डिप्लोमेसी'

अमरीका का कहना है कि इस अभ्यास का लक्ष्य बचाव की कार्रवाई करना है और इनकी पिछले हफ़्ते के उत्तर कोरियाई हमले से कई हफ़्ते पहले योजना बनाई गई थी.

इस अभ्यास में परमाणु हथियार और लड़ाकू विमान ले जाने में सक्षम अमरीकी युद्धपोत यूएसएस जॉर्ज वॉशिंगटन समेत लगभग 12 अमरीकी और कोरियाई नौसैनिक जहाज़ भाग ले रहे हैं.

अभ्यास के शुरु होते ही दक्षिण कोरियाई सीमा पर स्थित टापू के निवासियों को अस्थायी बंकरों में शरण लेने के आदेश दिए गए हैं.

एक दक्षिण कोरियाई समाचार एजेंसी ने कहा है कि उत्तर कोरिया अपनी मिसाइलें सीमावर्ती इलाक़ों की तरह ले जा रहा है.

बीबीसी के रक्षा संवाददाता निक चाइल्ड्स के अनुसार, "यह उस क्षेत्र में अमरीका का अपनी मौजूदगी बनाए रखने का एक संकेत है. यह ऐसा क़दम है जिस पर चीन की भी नज़र है."

उनका कहना है, "अमरीका इस 'गनबोट डिप्लोमेसी' का शीत युद्ध के समय से इस्तेमाल करता आया है. दशकों से इसके ज़रिए संदेश दिए जाते रहे हैं. लीबिया को 1980 के दशक में, इराक़ को 1990 के दशक में और चीन-ताईवान तनाव के दौरान 1996 में ऐसा किया गया था."

बीबीसी संवाददाता का कहना है कि ये और बात है कि उत्तर कोरिया को इस क़दम से कोई संदेश मिलता है या नहीं. उनका कहना है कि इसी के साथ ये भी देखने होगा कि अन्य देश इस क़दम पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं.

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