नीतीश की आंधी में बुझ गई लालटेन, उड़ गई झोपड़ी

नई दिल्ली, 24 नवंबर (आईएएनएस)। बिहार विधानसभा के पिछले चुनाव और उसके बाद हुए लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद टिमटिमा रही राष्ट्रीय जनता दल (राजद) की 'लालटेन' की लौ इस बार के विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार की आंधी में पूरी तरह बुझ गई। इस आंधी ने जहां लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) की 'झोपड़ी' उड़ा दी वहीं कांग्रेस के 'हाथ' को ही चुनावी परिदृश्य से पूरी तरह ओझल कर दिया।

निश्चित तौर पर पहली बार विकास की स्वाद चखने वाली बिहार की जनता ने पेशे से इंजीनियर नीतीश को अपने सिर आंखों पर बिठाया और विकास को और आगे ले जाने की फिर से उन्हें जिम्मेदारी सौंपी लेकिन विकास के साथ-साथ नीतीश ने जो चुनावी सोशल इंजीनियरिंग की यह उसी का कमाल था कि उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के साथ मिलकर तीन चौथाई बहुमत हासिल किया। और यही वजह है कि अब उन्हें राजग के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में देखा जाना शुरू हो गया है।

आंकड़ों के मुताबिक इस चुनाव में जनता दल (युनाइटेड) को 115 सीटें मिलीं जबकि उसकी सहयोगी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को 91 सीटें मिलीं। दोंनों दलों को 206 सीटों पर जीत मिली है जबकि राजद और लोजपा गठबंधन 28 सीटों तक सिमटकर रह गया। कांग्रेस को महज चार सीटें ही मिल सकीं।

इस चुनाव में न तो कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी का करिश्मा दिखा और न ही लालू-पासवान का सामाजिक समीकरण काम आया। नीतीश की आंधी में सब उड़ गए। करिश्मा दिखा तो सिर्फ उन्हीं का। विकास के रथ पर सवार होकर उन्होंने पिछड़ों में अति पिछड़ों, मुसलमानों में पसमांदा मुसलमानों, दलितों में महादलितों, अगड़ी जातियों में गरीबों को ढूंढकर जो सोशल इंजीनियरिंग का तीर छोड़ा वह सटीक निशाने पर लगा।

नीतीश के नेतृत्व में बिहार में विकास की जो बयार चल निकली है उस पर मतदाताओं ने दरअसल अपना मुहर लगाया है। इसलिए अगले पांच सालों में नीतीश के समक्ष बड़ी चुनौती यही होगी कि उन्होंने बिहार की जनता को विकास का जो स्वाद चखाया है उसे वह आगे कैसे बढ़ाते हैं।

बहरहाल, खुद नीतीश को भी इसका पूरा एहसास है। इसलिए जीत के बाद संवाददाताओं से मुखातिब होते हुए उन्होंने कहा, "इस मौके पर मैं प्रदेश की जनता को एक ही वचन देना चाहूंगा और वह यह है कि जिस प्रकार हमने पिछले पांच सालों में मेहनत की, आने वाले दिनों में हम उससे भी ज्यादा मेहनत करेंगे। मेहनत से पीछे नहीं हटेंगे। बीच-बीच में प्रकृति भी इम्तहान लेती रहती है लेकिन हम इससे विचलित नहीं होंगे।"

मुख्यमंत्री बनने के बाद नीतीश कुमार ने उस बिहार के नवनिर्माण का काम शुरू किया, जो अपनी गंदी राजनीति, खराब शासन और निम्नस्तर की जिंदगी के लिए बदनाम रहा है। कोई शोरगुल किए बगैर नीतीश ने सड़कों का निर्माण कराया, लम्बे समय से लम्बित अधारभूत परियोजनाओं को पूरा कराया, ध्वस्त हो चुकी शिक्षा प्रणाली को फिर से खड़ा करने के लिए एक लाख स्कूली अध्यापकों की नियुक्ति की, स्वास्थ्य केंद्रों में चिकित्सकों की उपस्थिति और दवाइयों की उपलब्धता सुनिश्चित कराई। चुनावी नतीजे दरअसल, नीतीश के इन्हीं कामों पर जनता की मुहर है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि नीतीश कुमार ने अपराधियों पर लगाम कसा। उन्होंने आपराधिक मामलों की सुनवाई तेज करने का आदेश दिया। परिणामस्वरूप 54,000 से अधिक अपराधियों को दोषी ठहराया गया। इनमें से कई सारे राजनीतिज्ञ थे। कहना न होगा कि अपराध के लिए कुख्यात रहा बिहार इतना सभ्य हो गया कि पटना जैसे शहरों में युवतियां रात को बाहर निकलने से अब नहीं हिचकतीं। नीतीश कुमार की जीत में उनके जिस एक कदम ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, वह है लड़कियों को साइकिल मुहैया कराना, ताकि वे आसानी से स्कूल-कॉलेज जा सकें।

सही मायनों में देखा जाए तो यह जीत नीतीश को उनके काम का जनता की ओर से इनाम है, जो एक नई कहानी लिख रहा है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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