व्यवस्था में परिवर्तन चाहते थे जेपी

नई दिल्ली, 24 नवम्बर (आईएएनएस)। लोकनायक जयप्रकाश नारायण विराट प्रतिभा के धनी थे। उनकी कमी आज भी महसूस होती है। वर्ष 1974 के समय में छात्र आंदोलन शुरू हो चुका था। तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने अपने वोट बैंक को एक प्रकार से मानो गिरफ्त में ले लिया था। ऐसी परिस्थिति में लोकनायक ने समाज के सबसे पिछड़े तबके को मुख्यधारा में लाने का सफल प्रयास किया था। लोकनायक के जेहन में समाज के सभी वर्गो को शासन में भागीदार बनाने की योजना थी। इसके लिए उन्होंने युवाओं को आगे बढ़ाने का निर्णय किया था।

पटना के गांधी मैदान में 22 मई, 1974 को जयप्रकाश को लोकनायक की उपाधि दी गई थी। युवा लोकतंत्र को विकसित करने के लिए जेपी ने जनप्रतिनिधियों की समाज के प्रति भागीदारी विषय पर युवा सम्मेलन आयोजित करने का आदेश दिया था। इसमें जनप्रतिनिधयों को वापस बुलाए जाने की भी व्यवस्था करने की बातें बताई गई थीं। जयप्रकाश ने देश की जनता को सड़ी-गली व्यवस्था के परिवर्तन के लिए संपूर्ण क्रांति का नारा दिया था। तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियां भी कांग्रेस के पक्ष में थी। जातीय समीकरण कांग्रेस के पक्ष में थी। जेपी उस व्यवस्था में परिवर्तन चाहते थे।

जेपी के मार्गदर्शन में आंदोलन और परिवर्तन हुए। जेपी के आदर्श के अनुरूप सरकारें बनीं। जनता आशान्वित थी, लेकिन परिवर्तन के आसार नजर नहीं आए। राजतंत्र की व्यवस्था के बाद जब लोकतंत्र को सम्हालना पड़ता है, तो कई कठिनाइयां उसके सामने आ जाती हैं और यही उस समय भी हुआ। मसलन भूमि का बंटवारा नही हो पाया। इन सब कारणों से जेपी निराश हो गए। स्वास्थ्य भी उनका साथ नहीं दे रहा था।

संगठन व सवरेदय से जुड़े लोग भी सुविधा भोगी हो गए थे। संगठन के लिए प्राप्त वस्तुओं का उपयोग व्याक्तिगत कार्यो में किया जाने लगा था। फिर आरएसएस के लोगों की दोहरी सदस्यता का सवाल सामने आया। जनता पार्टी भी विखंडित हो गई। इन सब कारणों से जेपी अत्यधिक निराश हो गए। उन्हें लगा कि जनता को जो मिलना चाहिए वह नहीं मिल पाया है।

जेपी ने छात्रों को जात-पात तोड़ने का नारा दिया था। युवा वर्ग में इसके प्रति जबरदस्त उत्साह देखा गया। लोगों ने अपना जनेउ तोड़ फेंका। लेकिन आरएसएस के सदस्यों को यह गवारा न हुआ। जेपी आंदोलन के महत्व को कम करने की साजिश आरम्भ हो चुकी थी, लेकिन जेपी से जुड़े लोगों ने मंत्री पद के लिए नैतिकता को तिलांजलि दे दी। जिन तत्वों के लिए जेपी जीवन भर लड़ते रहे, उन्हीं को बढ़ावा दिया जाने लगा। आज भी उन्हीं तत्वों का भारत पर राज चल रहा है।

छात्र आंदोलन के समय राजनीतिक दलों को आंदोलन से जोड़ने का विराध किया गया था। जेपी इस निर्णय से सहमत थे। उन्होंने मुझे इस आंदोलन का संयोजक बनाया था। साथी लोग नाराज थे। यहां तक कि जेपी के समक्ष यह भी शिकायत की गई कि मैं कांग्रेस पार्टी में मिल गया हूं। जातिगत आधार पर दोषारोपण किया गया, लेकिन जेपी की पारखी नजर वास्तविकता को जानती थी।

जेपी कार्यकर्ताओ का पूरा ख्याल रखते थे या यह कहा जाए कि कार्यकर्ताओ के प्रति समर्पित थे, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। उन दिनों आपातकाल लागू हो गया था। मुझे मीसा के तहत जेल भेजने की तैयारी तत्कालीन सरकार कर चुकी थी। उस दौरान मेरी पत्नी राबड़ी देवी गर्भवती थीं। मैने जेपी के समक्ष अपनी समस्या रखी। उन्होंने इस समस्या का निराकरण कराया।

एक बार गांधी मैदान मे जेपी ने जेल भरो का नारा दिया था। जनसंघी मानसिकता वाले युवा जेल जाने के लिए नाम लिखाने में सबसे आगे रहे, लेकिन जब जेल जाने की नौबत आई तो सभी भाग खड़े हुए। उस समय आचार्य राममूर्ति भी मौजूद थे। जेपी ने फौरन मुझे याद किया, टेलीफोन से सूचना दी गई की एक भी आदमी नहीं है, लगता है आंदोलन असफल हो जाएगा।

मैने तुरंत स्थानीय यारपुर मोहल्ला के धुरी सिंह और ददन सिंह सहित 15 से 30 लड़कों की टोली को तैयार किया। सभी लोंगों को जीप मे बिठाकर गांधी मैदान लाया। हम लोग तिलक लगाकर जेपी जिंदाबाद के नारे लगाते हुए चल रहे थे। पुलिस ने हम सभी को पकड़कर जीप में बैठा लिया और बक्सर सेंट्रल जेल में ले जाया गया। छात्र काफी घबरा गए थे। बक्सर जेल के गेट से सभी छात्र भाग खड़े हुए। समाचार पत्रों मे जब यह खबर प्रकाशित हुई तो जेपी घबरा गए। उन्होने फोन पर कहा कि उन लोगों को खोजने की जरूरत है नहीं तो पुलिस वालों की नौकरी चली जाएगी।

जेपी के साथ कुछ स्वार्थी तत्व भी जुटने लगे थे। प्रभावती जी नहीं थी, मात्र गुलाब यादव नामक एक युवक था जो उनकी सेवा में लगा रहता था। प्रभावती जी अगर होती तो उन स्वार्थी तत्वों को बाहर निकाल फेंकती। जब चुनाव का समय आया तो बड़े पैमाने पर युवाओं के टिकट काट दिए गए थे। मुझे टिकट नहीं देने की भी साजिशें रची गईं लेकिन जेपी ने सभी को नजरअंदाज कर मुझे संसदीय चुनाव लड़ने के लिए जनता पार्टी के टिकट का बंदोबस्त किया।

जेपी की कमी आज भी महसूस हो रही है। देश की व्यवस्था में लीडरशिप का अभाव दिखता है। विपक्ष बिखरा हुआ है। जेपी जैसा कोई नेता नहीं है जो सभी को एक कर सके। मेरी नजर में एक पार्टी की सरकार की स्थिति दूर-2 तक दिखाई नहीं देती है। शिक्षा का भगवाकरण किया जा रहा है। जेपी गांधी युग के नेता थे। आज अगर वे होते ते वे इसका विरोध करते। जेपी के आदशरें के अनुरूप जब हमने सामाजिक न्याय को जगाने आरम्भ किया, तो हमारे खिलाफ भी साजिशें आरम्भ हो गईं। आज जेपी होते इस तरह की स्थिति देखने को नहीं मिलती।

(डायमंड पॉकेट बुक्स प्रा. लि. से प्रकाशित पुस्तक 'जे.पी. जैसा मैंने देखा' से साभार)

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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