नीतीश कुमार : मन से समाजवादी और विनम्र राजनीतिज्ञ

पटना, 24 नवंबर (आईएएनएस)। बिहार में बदलाव का नया इतिहास रचने वाले नीतीश कुमार लगातार दूसरी बार राज्य की सत्ता पर काबिज होने जा रहे हैं। इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने वाले नीतीश कुमार ने भले ही राजनीति में कदम रखा हो। लेकिन उनके इंजीनियरिंग का हुनर बिहार की 'सोशल इंजीनियरिंग' में स्पष्ट रूप से उभर कर सामने आया है।

अच्छे शासन के प्रति अपनी निजी प्रतिबद्धता रखने वाले नीतीश (59) समाजवादी सिद्धांतों पर चलने वाले विनम्र स्वभाव के राजनीतिज्ञ हैं। उन्होंने अपने जनता दल (युनाइटेड) और सहयोगी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) गइबंधन की राज्य में ऐतिहासिक जीत का नेतृत्व किया है।

बिहार और देश की राजनीति में तमाम उतार-चढ़ाव के बावजूद नीतीश कुमार जहां भी रहे, उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाए रखी। अपने सभी समकक्षों में वह हमेशा अलग नजर आए। उनकी इसी विशेषता ने आज उनहें राज्य की राजनीति का सितारा बना दिया है।

राज्य की सत्ता में पहला कदम नीतीश के लिए भी अच्छा नहीं साबित हो पाया था। वह तीन मार्च, 2000 को पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने थे। लेकिन बहुमत साबित न कर पाने के कारण उन्हें एक सप्ताह के भीतर ही इस्तीफा देना पड़ा था।

पांच वर्ष बाद वह फिर भाजपा के सहयोग से मुख्यमंत्री बने। भाजपा एक ऐसी पार्टी है, जिसके साथ वह 1996 से हैं, लेकिन उसके हिंदुत्व के मुद्दे को वह सख्ती से खारिज करते हैं।

मुख्यमंत्री बनने के बाद नीतीश कुमार ने उस बिहार के नवनिर्माण का काम शुरू किया, जो अपनी गंदी राजनीति, खराब शासन और निम्नस्तर की जिंदगी के लिए बदनाम रहा है।

कोई शोरगुल किए बगैर नीतीश ने सड़कों का निर्माण कराया, लम्बे समय से लम्बित अधारभूत परियोजनाओं को पूरा कराया, ध्वस्त हो चुकी शिक्षा प्रणाली को फिर से खड़ा करने के लिए एक लाख स्कूली अध्यापकों की नियुक्ति की, स्वास्थ्य केंद्रों में चिकित्सकों की उपस्थिति और दवाइयों की उपलब्धता सुनिश्चित कराई।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि नीतीश कुमार ने अपराधियों पर लगाम कसा। उन्होंने आपराधिक मामलों की सुनवाई तेज करने का आदेश दिया। परिणामस्वरूप 54,000 से अधिक अपराधियों को दोषी ठहराया गया। इनमें से कई सारे राजनीज्ञ थे।

कहना न होगा कि अपराध के लिए कुख्यात रहा बिहार इतना सभ्य हो गया कि पटना जैसे शहरों में युवतियां रात को बाहर निकलना शुरू कर दीं।

नीतीश कुमार की जीत में उनके जिस एक कदम ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, वह है लड़कियों को साइकिल मुहैया कराना, ताकि वे आसानी से स्कूल-कॉलेज जा सकें।

व्यापारी संतोष कुमार सिंह ने कहा, "नीतीश कुमार ने बिहार का चेहरा बदलने की कोशिश की और वह उसमें कुछ हद तक कामयाब हुए।"

लालू प्रसाद की ही तरह नीतीश कुमार भी 1970 के दशक में शुरू हुए बिहार के छात्र आंदोलन की पैदाइश हैं। वह आज भी खुद को अंदर से समाजवादी मानते हैं।

समाजवादी सिद्धांतों का पालन करते हुए नीतीश ने अपने परिवार को हमेशा राजनीति से दूर रखा। लेकिन उसी समाजवादी परम्परा के लालू प्रसाद की स्थिति नीतीश से ठीक उल्टी है। लालू प्रसाद का पूरा परिवार उनकी पार्टी में शामिल है। यही नहीं उन्होंने अपने रिश्तेदारों को भी राजनीति की कुर्सियां बांटी। लेकिन आज वे सभी कुर्सियां उलट गई हैं।

नीतीश ने भाजपा के साथ रहते हुए भी अपने धर्मनिरपेक्ष विचारों को जाहिर करने में कभी संकोच नहीं किया। उन्होंने अपने इस सिद्धांत के साथ कभी समझौता नहीं किया। उन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को बिहार में प्रचार करने की छूट नहीं दी।

वर्ष 1951 में पैदा हुए नीतीश कुमार पहली बार 1985 में बिहार विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए थे। वह 1987 में युवा लोक दल के अध्यक्ष बने, और उसके दो वर्ष बाद अविभाजित जनता दल के महासचिव बने।

वर्ष 1989 में वह पहली बार लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए और उसके बाद पांच बार संसदीय चुनावों में बिहार से लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए।

वी.पी.सिंह के प्रधानमंत्रित्व काल में नीतीश केंद्र सरकार में पहली बार राज्य मंत्री बने। अटल बिहारी की सरकार में वह रेल मंत्री बने, लेकिन एक रेल हादसे के बाद उन्होंने पद से इस्तीफा दे दिया। हादसे में 250 लोग मारे गए थे। उसके बाद वह भूतल परिवहन व कृषि मंत्री के रूप में सरकार में वापस लौटे थे।

नीतीश ने दिल्ली में होते हुए भी बिहार में शासन करने का अपना लक्ष्य हमेशा सामने रखा था।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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