'राजा के खिलाफ कार्रवाई की इजाजत देने को बाध्य नहीं थे प्रधानमंत्री' (लीड-1)
अटार्नी जनरल जी. वाहनवती ने गुरुवार को सर्वोच्च न्यायालय में सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि डॉ. स्वामी जो कह रहे थे, वह कानून के अंतर्गत बिल्कुल तर्कसंगत नहीं था। वाहनवती पूर्व सांसद सुब्रह्मण्यम स्वामी के उस पत्र का जिक्र कर रहे थे, जिसमें उन्होंने प्रधानमंत्री से राजा के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने की मांग की थी।
इस मामले में पहली बार पेश हुए वाहनवती ने सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति जी. एस. सिंघवी और न्यायमूर्ति ए. के. गांगुली की पीठ के समक्ष यह बात कही। उन्होंने कहा कि स्वामी संबंधित अदालत में कोई शिकायत दर्ज किए बिना ही प्रधानमंत्री से कानूनी कार्रवाई का आदेश देने के लिए कह रहे थे।
वाहनवती न अदालत से कहा कि यह स्थापित परंपरा है कि जब तक कोई शिकायत दर्ज नहीं की जाए, तब तक अपनी पहल पर कानूनी कार्रवाही शुरू करने का सवाल ही नहीं उठता। सिर्फ शिकायत की स्थिति पैदा होने पर ही आदेश नहीं दिया जा सकता है।
अदालत से कहा गया कि स्वामी के 29 नवंबर 2008 के पत्र में कानूनी कार्रवाई का आदेश देने के लिए भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम (पीसीए) की धारा 13 का हवाला देना गलत था। उन्होंने कहा कि पीसीए की धारा 19 इस मामले में प्रासंगिक थी। इसके तहत स्वामी को सबसे पहले एक शिकायत दर्ज करानी थी।
उसके बाद सम्बंधित अदालत यदि इस निष्कर्ष पर पहुंचती कि इस शिकायत में प्रथम दृष्टया कार्रवाई करने का मामला बनता है, उसके बाद ही संबंधित अधिकारी से कार्रवाई की अनुमति की मांग की जा सकती थी।
वाहनवती ने कहा कि यदि कानून का शासन महत्वपूर्ण है, तो कानून का पालन करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
यह पीठ जनता पार्टी के नेता सुब्रमण्यम स्वामी की शिकायत पर सुनवाई कर रही है। सुनवाई बुधवार को भी जारी रहेगी।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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