जैविक कचड़े को प्लास्टिक में बदलेंगे बैक्टीरिया
द नीदरलैंड्स के टीयू डेल्फ्ट के जीन-पॉल मीजनेन ने बैक्टीरिया के खाने-पीने की आदतों में बदलाव लाकर और उन्हें प्रशिक्षित कर शर्कराओं को दोबारा इस्तेमाल में लाने वाली सामग्री में बदला है। इसलिए अब जैविक कचड़े का भी इस्तेमाल हो सकेगा।
आलू के छिलके को धूप के चश्मे में बदलने या गन्ने की शर्करा से कार बम्पर बनाने में आने वाली तकनीकी खराबियों को पहले ही दूर किया जा चुका है। वैसे वर्तमान विधि में बहुत दक्षता नहीं है, इसमें शर्करा का बहुत कम प्रतिशत ही कीमती उत्पादों में बदला जा सकता है।
नए प्रयोग में खाद्य उत्पादन के बाद बचने वाले जैविक व्यर्थ पदार्थो का कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। लिग्नोसेल्यूलोज इसी तरह का पदार्थ है। पौधों के डंठल और पत्तियों में पाया जाने वाला लिग्नोसेल्यूलोज लिगनिन और सेल्यूलोज का बना जटिल पदार्थ है। यह पदार्थ पौधे को कठोरता देता है।
मीजनेन कहते हैं, "दुर्भाग्य से जैविक व्यर्थ पदार्थो (कृषि उत्पाद के अपशिष्ट) से प्लास्टिक निर्माण अब भी एक खर्चीली प्रक्रिया है क्योंकि इसमें इन पदार्थो का पूरी तरह इस्तेमाल नहीं हो पाता है।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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