नेपाल में जारी संकट से पश्चिमी देश चिंतित
काठमांडू, 21 नवंबर (आईएएनएस)। नेपाल में जहां प्रधानमंत्री चुनाव दिसम्बर तक के लिए स्थगित हो गया है, वहीं माओवादियों ने सरकार को संसद में बजट पेश करने से रोक दिया है साथ ही अपनी गुरिल्ला सेना को भंग करने से इंकार कर दिया है। नेपाल में पसरी इन तमाम विषम परिस्थितियों को लेकर पश्चिमी देशों की सरकारें चिंतित हो गई हैं।
आस्ट्रेलिया, कनाडा, डेनमार्क, फिनलैंड, फ्रांस, जर्मनी, आयरलैंड, नीदरलैंड्स, नार्वे, स्विटजरलैंड, ब्रिटेन और यूरोपीय संघ (ईयू) के मिशन प्रमुखों ने शनिवार को एक संयुक्त बयान जारी कर कहा है कि समझौतों के आंशिक क्रियान्वयन को लेकर वे चिंतित हैं।
दक्षिण कोरिया और जापान के राजदूतों ने भी इस संयुक्त बयान में सभी राजनीतिक पार्टियों से आग्रह किया है कि उन्हें नेपाल की जनता से किए गए अपने वादों को पूरा करने के लिए खुद को फिर से सक्रिय करना चाहिए।
पश्चिमी देशों की ये चिंताएं, वर्ष 2006 में माओवादियों के प्रमुख पुष्प कमल दहाल प्रचंड और तत्कालीन प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोईराला के बीच हुए व्यापक शांति समझौते (सीपीए) की चौथी बरसी के मौके पर सामने आई हैं। इस समझौते के साथ ही माओवादियों के 10 वर्षीय हिंसक संघर्ष का अंत हुआ था और नेपाल ने राहत की सांस ली थी।
राजदूतों ने कहा है कि वे खासतौर से पूर्व माओवादी लड़ाकों के समावेशन और पुनर्वास, तथा नेपाली सेना के ढाचे के निर्धारण को लेकर चिंतित हैं।
राजदूतों ने कहा है, "सीपीए का यह एक केंद्रीय तत्व बना हुआ है।" उन्होंने कहा कि इस मुद्दे को निपटाना कभी आवश्यक नहीं रहा, क्योंकि माओवादियों के लगभग 20,000 लड़ाकों की निगरानी कर रही संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी 15 जनवरी से नेपाल छोड़ने की अपनी तैयारी में लगी है।
राजदूतों ने यह भी कहा कि नए संविधान की रचना का काम समय से पीछे चल रहा है और नेपाल के शासन और भावी ढाचे पर कोई सहमति नहीं बन पाई है।
राजदूतों ने आगे कहा है, "संविधान के पहले मसौदे को पेश करने में मात्र छह महीने शेष रह गए हैं। उस संविधान के जिसे अधिक समृद्ध, समतावादी व लोकतांत्रिक नेपाल को लेकर नागरिकों की आशाओं पर खरा उतरना है।"
बयान में कहा गया है, "राजनीतिक पार्टियों को हिंसा त्याग कर कानून के शासन के सम्मान में शांति स्थापित करने के लिए एकजुट होकर काम करना चाहिए।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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