2जी स्पेक्ट्रम : 'स्वामी के हर पत्र का जवाब दिया गया' (लीड-2)

इसके साथ ही बताया गया कि तत्कालीन संचार मंत्री ए.राजा के खिलाफ मुकदमा चलाने का निर्णय इसलिए नहीं लिया जा सका क्योंकि केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) द्वारा इस मामले में जुटाए गए सबूतों का सावधानी से परीक्षण किए बगैर यह निर्णय नहीं लिया जा सकता था।

प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से 2जी स्पेक्ट्रम मामले में ए.राजा पर मुकदमा चलाने की मंजूरी हासिल करने के लिए पूर्व सांसद सुब्रमण्यम स्वामी की ओर से प्राप्त पत्रों और उन पर दिए गए जवाब के विवरण के साथ शनिवार को सर्वोच्च न्यायालय में एक हलफनामा दाखिल किया गया।

हलफनामे में कहा गया है कि केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्रालय ने प्रधानमंत्री कार्यालय को सुझाव दिया था कि "मुकदमा चलाने की मंजूरी देने सम्बंधी निर्णय जांच एजेंसी सीबीआई द्वारा इकट्ठा किए गए मौखिक या दस्तावेजी सबूत तथा सक्षम प्राधिकारी द्वारा उपलब्ध कराई गई अन्य सामग्रियों के परीक्षण के बाद ही लिया जा सकता है।"

यह हलफनामा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गुरुवार को दिए गए निर्देश के अनुसार पीएमओ में निदेशक वी.विद्यावती की ओर से दाखिल किया गया।

हलफनामे में कहा गया है कि विधि मंत्रालय में सहायक कानूनी सलाहकार द्वारा आठ फरवरी 2010 को दिया गया सुझाव विधि एवं न्याय मंत्री द्वारा विधिवत स्वीकृत था।

विधि एवं न्याय मंत्रालय ने अपना सुझाव प्रधानमंत्री कार्यालय के विधि विभाग के 29 मई, 2009 के एक संदर्भ के आधार पर दिया था।

विधि विभाग के कथित संदर्भ के पहले पीएमओ के सामने जो प्रश्न खड़ा हुआ था, वह यह था कि क्या 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में कथित संलिप्तता के लिए राजा के खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी देने के लिए "इस तरह के किसी अनुरोध पर विचार करने का कोई आधार है भी या नहीं।"

पीएमओ में इस मुद्दे पर मंथन की प्रक्रिया में यह भी बात उठी थी कि "पूर्व के मामलों में जिनमें किसी मंत्री के खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी मांगी गई थी, उन पर निर्णय विधि एवं न्याय मंत्रालय से राय लेने के बाद लिया गया था।"

हलफनामे में यह भी कहा गया है कि स्वामी द्वारा अक्टूबर 2009 में प्रधानमंत्री को लिखे गए एक पत्र की पावती स्वामी को भेजी गई थी जिससे उन्हें पता चल सके कि उनके आवेदन पर कार्रवाई की जा रही है।

सूत्रों ने कहा है कि 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन में अनियमितता के आरोपों से निपटने के संदर्भ में प्रधानमंत्री द्वारा उठाए गए कदमों की इस स्वीकारोक्ति को सरकार उस समय सामने लाएगी, जब सर्वोच्च न्यायालय मंगलवार को मामले की सुनवाई करेगा।

सूत्रों ने कहा है कि स्वामी द्वारा प्रधानमंत्री को लिखे गए पत्र का इस्तेमाल यह बताने के लिए किया जाएगा कि स्वामी ने कुछ महत्वपूर्ण जानकारी अदालत से छुपा रखी है और उन्होंने सारी जानकारी अदालत को नहीं दी है।

हलफनामे में कहा गया है कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने राजा के खिलाफ भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत मुकदमा चलाने की मंजूरी सम्बंधी स्वामी के आवेदन पर मई 2009 में विधि मंत्रालय से राय मांगी थी।

विधि मंत्रालय ने फरवरी 2010 में अपना जवाब दिया था। विधि मंत्रालय ने कहा था कि चूंकि केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) मामले की पहले से जांच कर रहा है, लिहाजा प्रधानमंत्री को किसी तरह की मंजूरी देने की कोई आवश्यकता नहीं है। हलफनामे में कहा गया है कि स्वामी के 20 नवम्बर, 2008 के आवेदन पर जवाब देने में प्रधानमंत्री की ओर से कोई देरी नहीं हुई थी।

हलफनामे में इस बात का ब्योरा दिया गया है कि स्वामी के हर पत्र पर कितने उचित तरीके से प्रतिक्रिया दी गई थी।

10 पृष्ठों के इस हलफनामे में स्वामी के पत्रों के संदर्भ में पीएओ द्वारा उठाए गए कदमों का भी जिक्र किया गया है।

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जी.एस.सिंघवी और न्यायमूर्ति ए.के.गांगुली की पीठ ने पीएमओ को विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया था। इसके पहले महाधिवक्ता गोपाल सुब्रमण्यम ने अदालत को गुरुवार को बताया था कि स्वामी के हर पत्र का जवाब दिया गया था और उस संदर्भ में कदम भी उठाए गए थे।

स्वामी ने मार्च 2010 में प्राप्त हुए एक जवाब के अलावा प्रधानमंत्री कार्यालय से किसी जवाब के प्राप्त होने से इंकार किया है।

स्वामी ने कहा है कि उन्होंने 20 नवम्बर, 2008 को प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर तत्कालीन संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री ए.राजा के खिलाफ भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत आपराधिक मामला चलाने की मंजूरी मांगी थी।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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