असम में जोर पकड़ सकती है अलग बोडोलैंड की मांग
कोकराझार, 20 नवंबर (आईएएनएस)। असम में जनजातीय बोडो समूह के राजनीतिक और उग्रवादी धड़ों के हाथ मिलाने से राज्य में पृथक 'बोडोलैंड' की मांग का आंदोलन एक नया रूप अख्तियार कर सकता है।
राज्य की कृषि मंत्री और 'बोडोलैंड पीपल्स फ्रंट'(बीपीएफ) की वरिष्ठ नेता प्रमिला रानी ब्रह्मा ने आईएएनएस को बताया, "बोडो लोगों के राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों को हासिल करने के लिए पृथक बोडोलैंड की मांग वाजिब है।"
असम में बीपीएफ कांग्रेस की सहयोगी पार्टी है। अलग राज्य की मांग को लेकर पश्चिमी असम के कोकराझार में शुक्रवार को बोडो राष्ट्रीय सम्मेलन सम्पन्न हुआ। इसमें विभिन्न 41 जनजातीय समूहों ने 30 लाख बोडो लोगों के लिए पृथक राज्य के गठन की आवश्यकता की जोरदार वकालत की।
इस दो दिवसीय सम्मेलन में बीपीएफ के अलावा नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड (एनडीबीएफ) और बोडो साहित्य सभा शामिल हुए।
एनडीबीएफ के महासचिव गोविंद बसुमातरी ने कहा, "1980 के दशक में पृथक 'बोडोलैंड' की मांग शुरू हुई, जो अब एक ज्वलंत मुद्दा बन चुका है। जब तक आंदोलन सार्थक और तार्किक तरीके से समाप्त नहीं होगा राज्य में शांति कायम नहीं हो पाएगी।"
उन्होंने ने कहा, "बोडोलैंड के लोग राजनीतिक और सांस्कृतिक अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे हैं।"
वर्ष 2005 में बसुमातरी के नेतृत्व में एनडीबीएफ गुट का भारत सरकार के साथ संघर्ष विराम का समझौता हुआ था। इसके बावजूद अभी तक शांतिवार्ता प्रारंभ नहीं हो पाई।
'डिवाइड असम 50-50' के नारे के साथ एक दशक पहले से हिंसात्मक हमलों का दौर चल रहा है। एनडीएफबी के साथ हिंसक गतिविधियों में शामिल रहा एक समूह 'बोडो लिबरेशन टाइगर्स'(बीएलटी) ने एक समझौते के तहत सामूहिक रूप से 2003 में आत्मसर्मपण कर दिया था।
बीएलटी के नेताओं ने बाद में बीपीएफ नाम से एक नई राजनीतिक पार्टी का गठन किया, जो फिलहाल राज्य में कांग्रेस की गठबंधन सरकार में शामिल है।
बीएलटी और केंद्र सरकार के बीच समझौते से हिंसा में नरमी लाने और 'बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद' (बीटीसी) के गठन का मार्ग प्रशस्त हुआ है।
गौरतलब है कि 'बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद' एक राजनीतिक प्रशासनिक ढांचा है, जिसकी अगुवाई अब बीपीएफ करती है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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