राजा मामले पर प्रधानमंत्री की 'चुप्पी' पर न्यायालय ने जताई नाराजगी (लीड-1)
सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान यह आपत्ति जताई। स्वामी ने 15 महीने पहले प्रधानमंत्री से इस सम्बंध में शिकायत की थी और कार्रवाई के लिए इजाजत की मांग की थी।
न्यायमूर्ति जी. एस. सिंघवी और न्यायमूर्ति अशोक कुमार गांगुली की खंडपीठ ने कहा कि प्रधानमंत्री कार्रवाई शुरू करने के लिए दस्तावेजों को अपर्याप्त बताकर इसकी मंजूरी नहीं भी दे सकते थे।
न्यायालय ने कहा कि यह प्रधानमंत्री की 'निष्क्रियता और चुप्पी का मामला है।' डॉ. स्वामी ने 29 नवम्बर 2008 को तत्कालीन दूरसंचार मंत्री ए. राजा के खिलाफ भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम के तहत कार्रवाई शुरू करने के लिए मंजूरी प्राप्त करने के लिए प्रधानमंत्री को आवेदन दिया था।
इसके बाद 19 मार्च 2010 को स्वामी को जवाब मिला जिसमें प्रधानमंत्री ने कहा कि 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की जांच चल रही है, इसलिए अभी राजा के खिलाफ कार्रवाई की मंजूरी देने के मामले में इस आवेदन पर निर्णय करना अपरिपक्व होगा।
न्यायालय ने कहा कि इस तरह के आवेदन पर फैसला लेने के लिए तीन महीने का समय अपर्याप्त हो सकता है और इसके लिए कुछ और समय की जरूरत पड़ सकती है लेकिन 15 महीने का समय बहुत लंबी अवधि है।
महाधिवक्ता गोपाल सुब्रह्मण्यम ने कहा कि यह तीन महीने की अवधि तब शुरू होती है जब जांच एजेंसी अपनी जांच पूरी कर ले न कि तब से जब आवेदन दिया गया था।
न्यायालय ने 19 मार्च 2010 के प्रधानमंत्री के पत्र में शामिल किए गए 'अपरिपक्व' शब्द पर भी आपत्ति जताई।
न्यायालय ने कहा कि यह कहा जा सकता था कि कोई निर्णय लेने के लिए स्वामी द्वारा उपलब्ध कराए गए दस्तावेज अपर्याप्त है लेकिन यह कहा गया कि आवेदन अपरिपक्व है।
न्यायालय ने कहा, "कार्रवाई की मांग करना लोकतंत्र में लोगों को दिया गया अधिकार है, और आपने कहा है कि उनका यह अधिकार परिपक्व नहीं है।"
गोपाल सुब्रहमण्यम ने कहा कि राजा के इस्तीफे के बाद उन पर कोई भी कार्रवाई शुरू करने के लिए स्वामी को किसी मंजूरी की जरूरत नहीं है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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