खंडहर में तब्दील हो चुका है ऐतिहासिक ब्रैडलॉफ सभागार (आठवां पैरा हटाते हुए संशोधित)

समाचार पत्र 'डेली टाइम्स' के अनुसार आधी सदी से ज्यादा अर्से तक सांस्कृतिक केंद्र रहा यह सभागार अपने जीर्णोद्धार की राह देख रहा है। इसे एक राजनीतिक संग्रहालय के रूप में संरक्षण दिया जाना चाहिए था, लेकिन यह खंडहर में तब्दील हो चुका है।

इसका नामकरण एक ब्रिटिश सांसद चार्ल्स बैड्रलॉफ पर किया गया था। वर्ष 1900 में तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सुरेंद्र नाथ बनर्जी ने इस इमारत का उद्घाटन किया था।

गौरतलब है कि चार्ल्स ब्रैडलॉफ स्वतंत्रता आंदोलन के बहुत बड़े समर्थक व नास्तिक थे और एक अलग तरह की विचारधारा से संबंध रखते थे। ब्रिटिश संसद के लिए चुने जाने पर उन्होंने बाइबल को साक्षी मानकर शपथ लेने से इंकार कर दिया था। ब्रैडलॉफ उन सांसदों में से थे, जो भारतीयों को अपना प्रतिनिधि स्वयं चुनने की वकालत करते थे।

अंग्रेज सरकार ब्रैडलॉफ के भारतीयों के प्रति लगाव को पसंद नहीं करती थी और उन्हें रेल पटरी बिछाने के ठेके से अलग कर दिया था। बाद में उन्हें देश छोड़ने को कहा गया था।

लाला लाजपत राय का भी इस सभागार में बड़ा योगदान रहा है। महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन के तहत उन्होंने इसी के भीतर नेशनल कॉलेज की स्थापना की थी। इसका उद्देश्य उन भारतीय छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करना था जो ब्रिटिश शैक्षिक संस्थानों में पढ़ने के इच्छुक नहीं थे।

इसके अलावा वर्ष 1928 में जब स्वतंत्रता सेनानियों ने साइमन कमीशन का बहिष्कार किया था, उस दौरान इसी सभागर में लाला लाजपत राय, मौलाना जफर अली खान और सईद अताउल्लाह शाह बुखारी ने व्याख्यानों का आयोजन किया था।

पूर्व प्रधानमंत्री और स्वतंत्रता सेनानी इंद्र कुमार गुजराल इस सभागार को दूसरे तरीके से परिभाषित करते हैं। गुजराल का कहना है कि उनका राजनीतिक सफर यहीं से शुरू हुआ। यहां उन्होंने एवं अन्य लोगों ने छात्र संघ का गठन किया था और यहीं उन्होंने पहली बार जवाहर लाल नेहरु के क्रांतिकारी व्याख्यान सुने थे।

बंटवारे के बाद ब्रैडलॉफ सभागार में दोबारा एक तकनीकी शिक्षा केंद्र खोला गया था। इसके कब्जे को लेकर निदेशकों के बीच विवाद छिड़ गया और बाद निजी शैक्षणिक संस्थान चलाने के लिए इसे किराये पर दे दिया गया।

अंत में 'ईवैक्वी ट्रस्ट प्रोपर्टी बोर्ड' (ईटीपीबी) ने सभागार पर कानूनी अधिकार का दावा किया और इमारत को कब्जे में ले लिया। सभागार वर्ष 2009 से बंद है।

इमारत फिलहाल अपराधियों का अड्डा बन चुकी है। इसमें तकरीबन 25 से 30 परिवार रहते हैं जबकि यहां एक प्रिंटिंग प्रेस भी है।

पंजाब असेंबली में सभागार के संरक्षण को लेकर चर्चा हो चुकी है और सरकार से इस बारे में ठोस कदम उठाने के लिए कहा गया है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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