दिल्ली में काम और शादी के लिए स्कूल छोड़ देते हैं बच्चे (14 नवंबर, बाल दिवस पर विशेष)

नई दिल्ली, 14 नवंबर (आईएएनएस)। शिक्षा का अधिकार अधिनियम ने छह से 14 वर्ष की उम्र के बच्चों के लिए शिक्षा भले ही अनिवार्य बना दी हो, लेकिन लगता है कि दिल्ली के गिने-चुने स्कूल ही इस अधिनियम के बारे में जानते हैं, क्योंकि उन्होंने काम, शादी, लम्बी अनुपस्थिति और शुल्क न जमा कर पाने जैसे कारणों से बच्चों को स्कूल से निकालने का रास्ता चुना है।

इस बात का खुलासा सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम के तहत दायर किए गए आवेदन से हुआ है। इस खुलासे में यह बात भी सामने आई है कि राजधानी में शिक्षा निदेशालय के तहत आने वाले 28 जोन में से मात्र दो जोन ही ऐसे हैं, जो सरकारी स्कूल छोड़ने वाले बच्चों के बारे में जानकारी दे सकने की स्थिति में हैं।

आरटीआई कार्यकर्ता मनीष भटनागर का कहना है कि जब उन्होंने स्कूल छोड़ने वाले बच्चों के बारे में 2009-10 में जानकारी मांगी तो राज्य शिक्षा विभाग के उपखण्डीय अधिकारियों के पास इस तरह का कोई विवरण ही नहीं था।

भटनागर ने उसके बाद स्कूल छोड़ चुके बच्चों की संख्या के बारे में जानकारी हासिल करने के लिए शिक्षा निदेशालय में आवेदन किया, लेकिन दिल्ली के 28 जोन में से मात्र उत्तर पश्चिम और बाहरी जोन से ही इस बारे में जवाब मिला। बाकी जोन से कोई जानकारी प्राप्त नहीं हुई।

भटनागर ने कहा, "इन दोनों जोन में भी स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की स्थिति चौंकाने वाली थी। प्राप्त जानकारी से पता चला कि आठवीं और नौवीं कक्षाओं की अधिकांश लड़कियों को स्कूल छोड़ने के प्रमाण पत्र (एसएलसी) इसलिए जारी कर दिए गए थे, क्योंकि उन्हें शादी करनी थी। जबकि कुछ स्कूलों ने लड़कों को एसएलसी इसलिए जारी कर दिया था, क्योंकि उन्हें काम करना था।"

आरटीआई के निष्कर्षो में कहा गया है कि यूके राजकीय सर्वोदय कन्या विद्यालय, दरियापुर कलां, दिल्ली ने पांचवीं कक्षा की छात्रा कंचन को इस बात का जिक्र करते हुए एसएलसी जारी किया था कि उसका परिवार मजदूरी के लिए अपने गृह राज्य बिहार जा रहा है, लिहाजा काम में परिवार की मदद करने के लिए उसकी आवश्यकता है।

उसी स्कूल ने कहा है कि प्रशासन ने 10वीं कक्षा की छात्रा सोनम को इसलिए एसएलसी जारी किया है, क्योंकि उसकी शादी होने वाली थी।

होलम्बी कलां, मेट्रो विहार, सी-ब्लाक स्थित राजकीय सहशिक्षा माध्यमिक विद्यालय के अनुसार मौजूदा सत्र में पांचवी कक्षा के छात्र राकेश को एसएलसी प्रदान किया है, जो कि मजदूरी करता है और लम्बे समय से कक्षा में अनुपस्थित था।

उत्तर पश्चिम दिल्ली के लगभग सभी स्कूलों ने जवाब दिया है कि ज्यादातर बच्चों को लम्बी अनुपस्थिति और फीस न दे पाने जैसे कारणों से स्कूल से बाहर किया गया है।

बच्चों के अधिकार के लिए काम करने वाली गैर सरकारी संस्था, 'बचपन बचाओ आंदोलन' (बीबीए) के राष्ट्रीय सचिव राकेश सिंघर ने आईएएनएस को बताया, "दिल्ली सरकार द्वारा संचालित स्कूलों की स्थिति निस्संदेह ऐसी ही है। सरकारी स्कूलों के अध्यापक और अधिकारी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार (आरटीई) अधिनियम 2009 के बारे में बहुत कम

जानते हैं।"

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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