सू ची को झुका न सका सैन्य शासन
पिछले 20 सालों में 15 साल नजरबंदी में गुजारने वालीं सू ची के व्यक्तित्व को निखारने में बौद्ध ध्यान ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस ध्यान ने सू ची को उनकी लड़ाई के खिलाफ ताकत दी।
सू ची का जन्म 19 जून 1945 में हुआ। वह जब दो साल की थीं तभी बर्मा की स्वतंत्रता के नायक उनके पिता जनरल आंग सान की हत्या राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों ने कर दी।
उनकी माता खिन की ने नए स्वतंत्र देश में कई पदों को सुशोभित किया। खिन भारत में राजदूत भी रहीं। सू ची विदेश में बड़ी हुईं और उन्होंने ब्रिटेन के ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से वर्ष 1967 में दर्शन और अर्थशास्त्र में उपाधि हासिल की।
वर्ष 1972 में सू ची ने ब्रिटेन के नागरिक माइकेल एरिस से शादी की। एरिस से उनके दो बच्चे अलेक्जेंडर और किम हुए। अमेरिका में रहते हुए सू ची ने संयुक्त राष्ट्र और न्यूयार्क अस्पताल में एक स्वयंसेवक के रूप में काम किया।
वर्ष 1962 में उनके पिता के सहयोगी जनरल ने विन ने देश में समाजवाद की ओर ले जाने के लिए लोकतांत्रिक सरकार का तख्ता पलट दिया। वर्ष 1988 में सू ची यंगून लौटीं।
इस दौरान यहां के लोगों ने सैन्य शासक ने विन के खिलाफ व्यापक रूप से प्रदर्शन किया। तनाशाही रवैया अपनाते हुए सेना प्रमुख ने हजारों की संख्या में प्रदर्शन करने वाले छात्रों, बौद्ध भिक्षुओं और नागरिकों की आवाज दबाने के लिए सेना को जुल्म ढाने का आदेश दिया।
सेना ने प्रदर्शनों को बेदर्दी से कुचला और हजारों लोग मारे गए, जबकि भारी संख्या में लोग घायल हुए और जेल भेजे गए।
प्रदर्शनों को कुचलने के बाद भी सू ची के नेतृत्व में लोकतंत्र के समर्थन और उसकी वापसी की मांग उठती रही। इस दौरान अपने पिता आंग सान की प्रतिमा के समक्ष लोगों को संबोधित करते हुए सू ची ने कहा, "अपने पिता की तरह मैं भी देश में जो कुछ हो रहा है, उसे सहन नहीं कर सकती।"
शीघ्र ही सू ची म्यांमार के मुख्य विपक्षी दल 'नेशनल लीग फार डेमोक्रेसी' (एनएलडी) को दशा और दिशा देने लगीं। सू ची के लोकतंत्र वापसी के प्रयासों को उस समय तगड़ा झटका लगा जब ने विन के बाद देश की बागडोर सैन्य शासन के हाथ में आई।
सैन्य शासन ने देश का नाम बर्मा से बदलकर म्यांमार और राजधानी रंगून से यंगून कर दिया। इस बीच सैन्य शासन ने सू ची को नजरबंद भी किया लेकिन वह एनएलडी के उत्साह को कम नहीं कर सकी। वर्ष 1990 के चुनावों में एनएलडी ने 80 प्रतिशत सीटें जीतीं।
इसके बाद सैन्य शासन ने सू ची को यंगून स्थित उनके घर में नजरबंद करते हुए उन्हें उनके पति और बहन से मिलने पर रोक लगा दी। घर में एक रेडियो था जिससे वह बाहरी दुनिया के बारे में जान पाती थीं। इसके माध्यम से ही उन्हें जानकारी हुई कि उन्हें शांति का नोबेल पुरस्कार मिला है।
अंतर्राष्ट्रीय दबावों के चलते सैन्य शासन को वर्ष 1995 में सू ची को रिहा करना पड़ा, लेकिन उसने सू ची को उनके बीमार पति को देखने जाने की इजाजत नहीं दी। वर्ष 1999 में उनके पति का निधन हो गया। इसके बाद सैन्य सरकार ने सू ची को फिर से नजरबंद कर दिया। उन्हें मई 2002 में रिहा किया गया। सैन्य शासन ने वर्ष 2003 में सू ची को एक बार फिर से नजरबंद किया और उनकी यह रिहाई शनिवार को हुई।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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