चश्मदीद मदान ने सुनाई बापू की शहादत की कथा

सरोज कुमार

नई दिल्ली, 12 नवंबर (आईएएनएस)। महात्मा गांधी की शहादत के चश्मदीद और ऑल इंडिया रेडियो के सेवानिवृत्त अधिकारी कृष्णदेव मदान ने बुधवार को उस दुखद घटना का चित्र लोगों के सामने प्रस्तुत किया, जिसने आज से करीब 62 वर्ष पहले देश ही नहीं दुनिया को स्तब्ध कर दिया था।

मदान 30 जनवरी, 1948 के दिन उस समय उस स्थल पर मौजूद थे, जहां नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी को गोली मारी थी। कृष्णदेव (के.डी.) मदान शायद जीवित बचे एकमात्र ऐसे व्यक्ति हैं, जिन्होंने अपनी आंखों से उस घटना को देखा था। लेकिन दुर्भाग्य यह कि मदान के बारे में आज तक कोई नहीं जानता था। जब मदान अवतरित हुए तो अचानक सबके लिए देवता बन गए। और इस देवता का अवतरण कराया पर्यावरणविद व गांधी मार्ग के सम्पादक अनुपम मिश्र ने।

मदान ऑल इंडिया रेडियो के अधिकारी थे और तब के बिड़ला हाउस और आज के गांधी स्मृति दर्शन समिति में, महात्मा गांधी द्वारा प्रार्थना पूर्व दिए जाने वाले भाषणों की रिकॉर्डिग करने हर रोज जाया करते थे। यह उनकी ड्यूटी थी। यह सिलसिला 19 सितम्बर, 1947 से शुरू हुआ और 30 जनवरी, 1948 को ही उसका अंत हो गया।

मदान ने बताया कि गांधी का यह भाषण रात नौ बजे के समाचार से पहले, 8.30 बजे से आधा घंटा प्रसारित किया जाता था। गांधी आधा घंटा हर रोज बोलते थे। उन्होंने बताया कि कभी-कभी वह थोड़ा अधिक बोल जाते थे, तो उसे संपादित करना पड़ता था।

उन्होंने बताया कि गांधी के करीब रहने वाली सुशीला नायर से कहा कि यदि बापू 29 मिनट ही बोलें तो अंश सम्पादित न करना पड़े। लेकिन इस पर नायर नाराज हो उठीं और उन्होंने मदान व उनके निदेशक की नौकरी तक लेने की धमकी दे दी। आखिर बापू का भाषण सम्पादित करने की हिम्मत कैसे हो गई।

लेकिन मदान ने अंत में एक दिन यह बात गांधी से ही कह डाली, और वह सहर्ष तैयार हो गए। गांधी ने कहा कि समय होते ही उंगली दिखा दिया करिए। फिर मदान ऐसा ही करने लगे। जैसे ही 29 मिनट होता, उंगली उठा देते, गांधी जहां भी रहते, वहीं रुक जाते। और कहते, "बस हो गया।" परिणाम यह हुआ कि गांधी के सभी भाषणों का अंत "बस हो गया" के साथ होने लगा, जो आज भी आर्काइव में मौजूद है।

गांधी का यह पक्ष प्रस्तुत करते समय मदान भावुक हो उठे। यही नहीं वहां मौजूद पश्चिम बंगाल के पूर्व राज्यपाल व गांधी के पोते, गोपालकृष्ण गांधी सहित सभी लोगों की आंखें छलछला उठीं। सुशीला नायर और गांधी के होने का यह फर्क था।

मदान ने कहा कि 30 जनवरी को जब 5.16 बजे नाथूराम ने पहली गोली चलाई, तो समझा गया कि कहीं कोई पटाखा छूटा है। उसके बाद दूसरी गोली चली, फिर तीसरी पर महात्मा गांधी गिर गए। उनके इर्द-गिर्द उपस्थित लोगों ने उन्हें बाहों में ले लिया। कुछ लोग नाथूराम के पास पहुंचे। नाथू ने उन्हें अपना हथियार सौंप दिया और अपने हाथ खड़े कर दिए। नाथू ने कोई प्रतिरोध नहीं किया।

गांधी के मुंह से अंतिम समय में 'हे राम' निकला था या नहीं, इस सवाल पर मदान ने कहा कि उन्होंने इस तरह के शब्द नहीं सुने। वैसे भी उस समय इतनी अफरा-तफरी थी कि गांधी के मुंह से निकले शब्द किसी ने सुना भी होगा, इसकी कल्पना नहीं की जा सकती।

मदान ने बताया कि गांधी के निधन की पहली घोषणा बीबीसी लंदन ने की थी। उसके बाद जवाहर लाल नेहरू ने बाहर आकर 5.30 बजे निधन की घोषणा की। ऑल इंडिया रेडियो से 5.50 बजे गांधी के निधन की खबर प्रसारित की गई।

मदान ने कहा कि उस समय सूचना का कोई साधन नहीं था, लेकिन 5.30 बजे तक बिड़ला हाउस के बाहर 25 से 30 हजार की भीड़ इकट्ठा हो चुकी थी।

तीस जनवरी मार्ग स्थित गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति में दिल्ली की सभी गांधीवादी संस्थाओं की ओर से बुधवार को यह कार्यक्रम आयोजित किया गया था।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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