झारखण्ड : भ्रष्टाचार और अस्थिरता में गुजरे 10 साल

रांची, 12 नवंबर (आईएएनएस)। झारखण्ड को बिहार से अलग कर एक नया राज्य बनाते वक्त सोचा गया था कि खनिज-संपदाओं से भरपूर इस राज्य का तेजी से विकास होगा, लेकिन लोगों की उम्मीदें पूरी नहीं हुईं। पिछले दस सालों में राज्य राजनीतिक अस्थिरता और भ्रष्टाचार के दुष्चक्र में फंसा रहा। झारखण्ड 15 नवंबर को अपनी स्थापना के दस साल पूरे करने जा रहा है।

इस बीच नक्सलवाद का प्रभाव आठ से बढ़कर 22 जिलों में फैल गया। राज्य में एक भी विशिष्ट विशेषज्ञता वाला अस्पताल नहीं है। राज्य की साक्षरता दर 54 फीसदी है, जो राष्ट्रीय औसत 65 फीसदी से बहुत कम है। राज्य के 54 फीसदी लोग गरीब हैं और प्रदेश में इसकी खपत से करीब आधे अनाज की ही पैदावार हो पाती है।

रांची निवासी राम बदाइक कहते हैं कि पूरे राज्य में गौरव करने लायक एक भी चीज नहीं है।

पिछले दस सालों में राज्य में आठ बार सरकारें बदलीं और दो बार राष्ट्रपति शासन लगे। अभी यहां भारतीय जनता पार्टी के अर्जुन मुंडा के नेतृत्व वाली सरकार है।

झारखण्ड के पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मराण्डी ने 2001 में कहा था कि भ्रष्टाचार के कारण उन्हें नींद नहीं आती है। लेकिन न सिर्फ वे इस पर लगाम लगा पाने में असफल रहे, बल्कि उन पर भ्रष्टाचार के आरोपियों को संरक्षण देने का भी आरोप लगा।

अर्जुन मुंडा की सरकार में 2004 में भू राजस्व मंत्री मधु सिंह पर 50 लाख रुपये रिश्वत मांगने का आरोप लगा था। इस पर काफी विवाद हुआ था। उन्हें बर्खास्त कर दिया गया था, लेकिन अगली सरकारें उनके खिलाफ जांच जारी नहीं रख पाईं।

रांची महिला कॉलेज की प्राचार्य सुशीला मिश्रा ने आईएएनएस से कहा कि ऐसा लगता है कि विकास यहां कभी कोई मुद्दा था ही नहीं। अधिकतर नेता और अधिकारी अपना भला करने में लगे हुए हैं।

राष्ट्रपति शासन के दिनों में कुछ अच्छा काम हुआ। नियुक्ति में धांधली के कारण 38 अधिकारियों को बर्खास्त किया गया।

इसके अलावा भारतीय प्रबंधन संस्थान और राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय की स्थापना राज्य के लिए अच्छी बात हुई लेकिन ऐसे उदाहरण बहुत कम हैं।

भारत की कुल खदानों और खनिज का 40 फीसदी इस राज्य में है इसके बावजूद झारखण्ड विकास में पिछड़ गया। उधर उत्तराखण्ड और छत्तीसगढ़ का विकास अधिक तेजी से हुआ, जबकि ये राज्य भी उसी साल बने थे।

झारखण्ड कांग्रेस के प्रवक्ता ने कहा कि झारखण्ड की सरकारें सड़क, बिजली, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं पर भी ध्यान नहीं दे पाईं। सरकारी अस्पतालों में करीब 1000 डॉक्टरों की कमी है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 70 फीसदी महिलाएं एनीमिया की शिकार हैं।

नक्सलवाद का भी प्रभाव यहां इस बीच काफी बढ़ा है। इसका सड़क और रेल परियोजनाओं पर बुरा असर पड़ा। झारखण्ड में बिजली उत्पादन 450 मेगावॉट से घटकर 300 मेगॉवाट हो गया।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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