हम भारत की आकांक्षा समझते हैं: चीन

हम भारत की आकांक्षा समझते हैं: चीन

सुरक्षा परिषद के स्थाई सदस्यों में से केवल चीन ने भारत की स्थाई सदस्यता के प्रयासों का स्पष्ट अनुमोदन नहीं किया है

अमरीका के संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थाई सदस्या के अनुमोदन के बाद चीन ने इस विषय पर अपनी सोच कुछ हद तक स्पष्ट की है.

चीनी विदेश मंत्रालय ने कहा है कि वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और संयुक्त राष्ट्र में भारत की बड़ी भूमिका निभाने की आकांक्षा समझता है और भारत के साथ-साथ अन्य सदस्यों के साथ सुरक्षा परिषद के सुधारों पर चर्चा के लिए तैयार है.

ग़ौरतलब है कि सोमवार को अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भारतीय संसद को संबोधित करते हुए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थाई सदस्यता का अनुमोदन किया था.

पाकिस्तान ने इस विषय में अपनी आपत्ति जताई थी और क्षेत्रीय सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय संबंधों का हवाला दिया था.

उधर बीबीसी के कूटनीतिक मामलों के संवाददाता जॉनाथन मार्कस का कहना है, "राष्ट्रपति ओबामा की घोषणा के बाद सुरक्षा परिषद के सुधारों का मुद्दा तो दोबारा एजेंडा पर आ गया है लेकिन इस विषय में जल्द बहुत ज़्यादा प्रगति की उम्मीद नहीं करनी चाहिए."

समाचार एजेंसियों के अनुसार चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता हॉंग ली ने कहा, "चीन अंतरराष्ट्रीय मामलों में भारत के कद की कद्र करता है. चीन संयुक्त राष्ट्र में भारत के बड़ी भूमिका निभाने की आकांक्षा को समझता है. चीन भारत और अन्य देशों के साथ सुरक्षा परिषद के सुधारों के बारे में चर्चा और संपर्क करने के लिए तैयार है."

प्रवक्ता हॉंग ली का कहना था, "चीन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के ज़रूरी और उचित सुधारों का समर्थन करता है. चीन विकासशील देशों को सुरक्षा परिषद में अधिक प्रतिनिधित्व देने को प्राथमिकता देगा ताकि वे बड़ी भूमिका निभा पाएँ."

चीनी विदेश मंत्रालय ने कहा कि चीन लोकतांत्रिक और सब्र वाली चर्चा चाहता है ताकि सुधार के मुद्दे पर सर्वसम्मति बन पाए ताकि छोटे-मोटे मतभेद ही बाकी बचें, एकता बनी रहे और सभी के लिए संतोषजनक स्थिति बने.

ग़ौरतलब है कि सुरक्षा परिषद के पाँच स्थाई सदस्यों में से केवल चीन ही है जिसने अब तक स्पष्ट तौर पर भारत की स्थाई सदस्यता का अनुमोदन नहीं किया है.

उधर बीबीसी के कूटनीतिक संवाददाता जॉनाथन मार्कस का कहना है कि ओबामा के कथन के बाद सुधार प्रक्रिया दोबारा एजेंडा पर आ गई है.

जब ओबामा ने भारत में उसके प्रयासों का अनुमोदन किया तो वे वही कह रहे थे जो भारतीय सुनना चाहते थे. अमरीका भारत को प्रोत्साहित करना चाहता है ताकि वह विश्व स्तर पर महत्वपूर्ण भूमिका अदा करे और ओबामा के कथन को इससे जोड़कर देखा जा सकता है.

लेकिन उनके कहने भर से भारत के लिए स्थाई सदस्य बनना कोई ज़्यादा आसान नहीं हो जाता है.

जॉनाथन मार्कस के मुताबिक दरअसल स्थाई सदस्य बनने वालों की कतार काफ़ी लंबी है. लेकिन पेचीदगी ये है कि किस-किस देश को सदस्यता मिले.

यदि दक्षिण अफ़्रीका स्थाई सदस्य बने नाईजीरिया क्यों नहीं? यदि ब्राज़ील बने तो मेक्सिको क्यों नहीं? यदि यूरोप में से जर्मनी बने तो इटली क्यों नहीं?

इस मुद्दे पर जल्द कुछ नहीं होने वाला और सुरक्षा परिषद के कामकाज की एक झलक जनवरी 2011 में देखने को मिलेगी जब भारत, दक्षिण अफ़्रीका और जर्मनी - ब्राज़ील और नाईजीरिया के साथ दो साल के लिए अस्थाई सदस्यों के तौर पर सुरक्षा परिषद में बैठेंगे.

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