वैश्विक मंदी से उबरने के लिए संगठित सोच की जरूरत : मुखर्जी
मुखर्जी ने कहा कि हमने हाल ही में वैश्विक मंदी से सीख ली है कि संगठित और सहयोगपूर्ण सोच के साथ ही ऐसी समस्याओं का हल निकाला जा सकता है। एकतरफा या अकेले रह कर इससे नहीं उबरा जा सकता। मुखर्जी भारत-अमेरिका के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों के मंच को आज संबोधित कर रहे थे।
मुखर्जी ने कहा कि एक देश की समस्या को हल करने की तत्परता में हमें दूसरे देशों खासकर विकासशील देशों में उभरते हुए बाजारों के लिए मुश्किलें खड़ी नहीं करनी चाहिए।
इस बैठक में अमेरिका के निधि सचिव टिमोथी गैथनर, वाणिज्य सचिव गेरी लक, कृषि सचिव थोमस विलसेक ने हिस्सा लिया। इस बैठक में भारत के वाणिज्य और कंपनी मामलों के मंत्री आनंद शर्मा, योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलूवालिया भी शामिल थे। इस बैठक में अमेरिका और भारत की विभिन्न कंपनियों के मुख्य कार्यकारी अधिकारी भी उपस्थित थे।
वित्त मंत्री ने कहा कि भारत दुनियाभर में निवेश के लिए एक आकर्षक देश के रूप में उभरा है। उन्होंने कहा कि 11वीं पंचवर्षीय योजना (2007-08 से 2011-12) में केवल बुनियादी क्षेत्र में ही निवेश के लिए 514 अरब अमेरिकी डलर की जरूरत है जिसमें से लगभग 30 प्रतिशत निजी स्रोतों से आने की उम्मीद है।
मुखर्जी ने बताया कि 12वीं पंचवर्षीय योजना (2012-13 से 2016-17) के लिए बुनियादी क्षेत्र में निवेश के एक खरब अमरीकी डलर तक पहुंचने की संभावना है। उन्होंने कहा कि निवेश को इस स्तर तक पहुंचाने के लिए एक आकर्षक वित्तीय व्यवस्था की जरूरत है। मुखर्जी ने कहा कि भारत-अमेरिका सीईओ मंच के सुझावों पर विचार करने के लिए हमने योजना आयोग के उपाध्यक्ष की अध्यक्षता में एक समति भी गठित की है। इस समिति की दो बार बैठकें भी हो चुकी हैं।
वित्त मंत्री ने कहा कि अमेरिका हमारे लिए निवेश और प्रौद्योगिकी में हमेशा से एक मुख्य स्रोत तथा एक महत्वपूर्ण व्यवसायिक भागीदार रहा है। आर्थिक नीतियां, वित्तीय और व्यापार हमारे द्विपक्षीय संबंधों के महत्वपूर्ण मुद्दे है। जैसे ही हम बुनियादी क्षेत्र में निवेश बढ़ाने के प्रयास करेंगे तथा निर्माण क्षेत्र को एक नया बल देंगे तो अमेरिका के साथ हमारी भागीदारी की महत्ता और बढ़ेगी। ऐसा करना दोनों देशों के लिए लाभकारी रहेगा। इससे नई नौकरियां पैदा होंगी तथा दोनों देशों के विकास को भी बढ़ावा मिलेगा।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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