देवी को प्रसन्न करने के लिए पत्थरबाजी
स्थानीय बोली में इस आयोजन को 'पत्थरों का मेला' के रूप में जाना जाता है। मेले के दौरान पुरुष एक मैदान में इकट्ठा होते हैं और एक-दूसर पर छोटे पत्थर फेंकते हैं। यह मेला राजधानी शिमला से लगभग 40 किलोमीटर दूर धामी गांव में लगता है।
मेला के आयोजक जगदीप सिंह ने आईएएनएस को बताया, "रस्म पूरी करने के लिए शनिवार की दोपहर 500 से अधिक लोग इस गांव में जुटे। पत्थरबाजी में घायल और लहूलुहान हुए लोग देवी काली (मंदिर में रखी मूर्ति) के कपाल पर अपना खून लगाते हैं।"
इस मेले की शुरुआत 18वीं सदी में तब हुई थी, जब एक व्यक्ति ने देवी काली को प्रसन्न करने के लिए अपनी बलि दी थी। बाद में बलि की प्रथा बंद हो गई और लोग देवी को प्रसन्न करने के लिए उनके कपाल पर मानव रक्त का 'तिलक' लगाने लगे।
पूर्ववर्ती सामंती राज परिवार के सदस्य जगदीप सिंह ने कहा कि शनिवार को पत्थरबाजी हालोग (तत्कालीन धामी राज्य की राजधानी) और जामोग गांव के निवासियों के बीच हुई।
रिवाज के मुताबिक लोग नए वस्त्र पहनकर घास भरी ढलान में कतार में खड़े होते हैं। पूर्ववर्ती राज परिवार के सदस्य एक तरफ खड़े होते हैं और दूसरी तरफ खड़े ग्रामीणों के पत्थरों का सामना करते हैं।
लोग राज परिवार के सदस्यों पर पत्थर तब फेंकना शुरू करते हैं, जब धामी के राजमहल स्थित नरसिंह मंदिर और काली देवी मंदिर से मूर्तियों को वहां लाया जाता है।
पत्थरबाजी अमूमन दोपहर में शुरू होती है और 30 मिनट तक चलती है।
एक दिन के इस मेले में स्थानीय लोग और पर्यटक शामिल होते हैं। मुम्बई से आए एक पर्यटक जॉय मैथ्यू ने बताया, "यह अनोखा और विस्मयकारी रिवाज है। मेले में अमीर और गरीब बिना प्रतिशोध भाव के शरीक होते हैं।"
मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इस रिवाज को मानवता के खिलाफ बताते हुए इस पर रोक लगाने की मांग की है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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