वक्त के साथ बदली है चुनाव की प्रक्रिया
भोपाल, 3 नवंबर (आईएएनएस)। भारत में पिछले छह दशकों में चुनावी प्रक्रिया वक्त के साथ काफी बदल चुकी है। कभी मतपत्र राज्य की पहचान के मुताबिक बनते थे और नेता सीधे मतदाता से संवाद करते थे, लेकिन अब मतपत्र की जगह इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन (इवीएम) ने ले ली है और नेता संचार माध्यमों पर निर्भर हो गए हैं।
चुनाव प्रक्रिया के इस बदले स्वरूप के बारे में बता रही है भारत निर्वाचन आयोग की हीरक जयंती पर भोपाल के समन्वय भवन में चल रही प्रदर्शनी। तीन दिन चलने वाली इस प्रदर्शनी में वर्ष 1951 से अब तक के चुनाव में आए बदलाव का प्रदर्शन किया गया है। देश के पहले आम चुनाव में मतपत्र पर राज्य की कूट संख्या हुआ करती थी। वहीं, 1962 में मतदाता की उंगली पर अमिट स्याही लगाने की शुरुआत की गई ताकि कोई व्यक्ति दोबारा मतदान न कर सके।
प्रदर्शनी में लगीं तस्वीरें बताती हैं कि पहले आम चुनाव वर्ष 1951 में मतदान सामग्री भेजने के लिए रोपवे तक का सहारा लेना पड़ा था। अब तो मतदान दल हाथी और हेलीकॉप्टर से भी मतदान स्थलों तक जाते हैं।
इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल वर्ष 1980 में इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन का प्रदर्शन किया गया था, जबकि चुनाव में इसका इस्तेमाल वर्ष 2004 में किया गया। अब तो लोकसभा के चुनाव में मतदान इवीएम के जरिए ही होता है।
प्रदर्शनी में चलचित्र के माध्यम से लोगों को मतदान की महत्ता और ईवीएम ने पर्यावरण की रक्षा किस तरह से की है, बताया जा रहा है। एक अनुमान के मुताबिक वर्ष 2004 के आम चुनाव में एक लाख इवीएम का इस्तेमाल किए जाने से लगभग एक लाख पेड़ों को कटने से बचाया गया था।
इतना ही नहीं चुनाव प्रचार का तरीका भी छह दशक में काफी बदल गया है। तस्वीरें इस बात की गवाही दे रही हैं कि शुरुआती दौर में नेता सीधे मतदाता के पास पहुंचते थे, अब नेता ज्यादातर सभाओं तक सीमित हैं। अब चुनाव प्रचार में संचार के साधनों का भी भरपूर इस्तेमाल होने लगा है। वर्ष 2000 के चुनाव तक दीवारें प्रचार सामग्रियों से रंगी होती थीं, लेकिन उसके बाद इस तरह के प्रचार पर रोक लगा दी गई।
इस प्रदर्शनी का सोमवार को उद्घाटन करते हुए राज्यपाल रामेश्वर ठाकुर ने युवा वर्ग के लिए प्रदर्शनी को उपयोगी बताते हुए जिला स्तर पर इसके आयोजन की बात कही थी। इस मौके पर राज्य निर्वाचन पदाधिकारी पीसी मीणा ने भी प्रदर्शनी की उपयोगिता बताई।
इस प्रदर्शनी के ज्यादातर पैनल अंग्रेजी भाषा में है जिसके चलते तस्वीरों के नीचे दर्ज ब्योरे को समझने में आम लोगों को परेशानी हो रही है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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