कारण बताओ नोटिस की रीढ़ है ईमानदारी : सर्वोच्च न्यायालय
नई दिल्ली, 31 अक्टूबर (आईएएनएस)। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि किसी भी अर्धन्यायिक प्राधिकरण को कोई कारण बताओ नोटिस जारी करते समय अपने संवैधानिक अधिकारों के उपयोग में ईमानदारी बरतनी चाहिए।
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जी.एस.सिंघवी और न्यायमूर्ति अशोक कुमार गांगुली की पीठ ने शुक्रवार को अपने फैसले में कहा था, "न्याय की जड़ विश्वास में है और न्याय एक अर्धन्यायिक कार्यवाही का भी लक्ष्य है।"
पीठ की ओर से न्यायमूर्ति गांगुली ने कहा, "यदि किसी अर्धन्यायिक प्राधिकरण को अपने अधिकार क्षेत्र के लोगों के दिमाग में भरोसा पैदा करना है तो इस तरह के प्राधिकरण को पूरी ईमानदारी के साथ अपनी कार्रवाई करनी चाहिए।"
अदाल ने कहा कि किसी कारण बताओ नोटिस का अर्थ यह होता है कि वह खास व्यक्ति को नोटिस में दर्ज प्रस्तावित आरोपों के खिलाफ अपनी आपत्तियां दर्ज कराने का एक उचित अवसर प्रदान करता है।
अदालत ने कहा, "यदि किसी कारण बताओ नोटिस को पढ़ कर कोई साधारण विवेक वाला व्यक्ति यह महसूस करता है कि कारण बताओ नोटिस का उसका जवाब का कोई अर्थ नहीं होगा और वह पूर्वनिर्धारित राय की अभेद्य दीवार के सामने केवल अपने अधिकारी को धक्का भर दे सकेगा, तो इस तरह का कारण बताओ नोटिस उचित प्रक्रिया नहीं शुरू करती।"
अदालत ने कहा कि कारण बताओ नोटिस जारी करते समय किसी भी प्राधिकरण को अपना दिमाग खुला रखने पर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि उसे दोष के निर्धारण में ईमानदारी बरतनी होगी।
सर्वोच्च न्यायालय ने यह बातें उस समय कही, जब उसने बम्बई उच्च न्यायालय के उस आदेश को दरकिनार कर दिया, जिसमें मैरीन प्रोडक्ट्स एक्सपोर्ट डेवलपमेंट अथारिटी (एमपीईडीए) द्वारा ओआरवाईएक्स फिशरीज प्राइवेट लिमिटेड के पंजीकरण को रद्द किए जाने को उचित ठहराया गया था।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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