एक गाँव की अजब कहानी

एक गाँव की अजब कहानी

शिवानंद गिरी

बेगूसराय से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

बिहार में चुनावी सरगर्मी परवान पर है. इस चुनावी माहौल में कई रोचक वाक्या सामने हैं, तो कुछ प्रेरक प्रसंग भी.

एक ओर नेता जहाँ विकास की बात पर वोट मांग रहे हैं, तो दूसरी ओर एक गांव ऐसा भी है जहाँ के लोगों की पहली मांग हैं कि उनके पूरे गांव को एक ज़िले समस्तीपुर में शामिल कर लिया जाय.

वजह है उनके गांव का तीन ज़िलों के तीन लोकसभा और तीन विधानसभा क्षेत्रों में होना. जी हां, हम बात कर रहे हैं बेगूसराय ज़िले के चमथा गांव की.

तीन जिलों के तीन अलग-अलग लोकसभा व विधानसभा क्षेत्रों में पड़ने से एक ओर विधायक और सांसदों की उपेक्षा का शिकार जनता को होना पड़ रहा है तो दूसरी ओर उम्मीदवारों के साथ मतदाताओं और प्रशासन को भी कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है.

दरअसल चमथा एक ऐसा गांव है जो चार ज़िलों का संगम है, जिसका अर्थ होता है चौमथ. इसी चौमथ शब्द से चमथा बना है.

दक्षिण से गंगा और उत्तर से बाया नदी से घिरा लगभग 35 हज़ार एकड़ ज़मीन में फैला चमथा गांव बड़खुट, छोटखुट, मांझिल खुट, संझापुर, गोपटोला, लक्ष्मण टोला, मंत्री टोला जैसे कुल 22 टोलों में बंटा हुआ है.

गांव की अधिकांश आबादी वाला चमथा एक, दो और तीन पंचायत बेगूसराय ज़िले के बछवाड़ा विधानसभा में, मंत्री टोला समस्तीपुर ज़िले के सरायरंजन विधानसभा के वाजितपुर पंचायत में, जबकि नंबर टोला की कुछ आबादी पटना ज़िले के मोकामा विधानसभा के मेकरा पंचायत में पड़ता है.

इसी तरह बछवाड़ा, सरायरंजन और मोकामा विधानसभा तीन ज़िलों बेगूसराय, समस्तीपुर और मुंगेर संसदीय क्षेत्रों में पड़ता है.

अल्पसंख्यक और भूमिहार जाति को छोड़ लगभग सभी जाति के लोग इस गांव में रहते हैं. लेकिन बहुसंख्यक आबादी राजपूतों और यादवों की है.

चमथा के पंचायत नंबर एक के मुखिया राकेश कुमार सिंह कहते हैं कि तीन ज़िलों के तीन विधानसभा क्षेत्रों में बंटे होने के कारण अबतक चमथा गांव का समुचित विकास नहीं हो सका है.

उनके मुताबिक़ इक्के-दुक्के कार्यों को छोड़ दें तो सारा कार्य पंचायत निधि से ही हुआ है. मुखिया के अनुसार गांव के अधिकांश लोगों का घर समस्तीपुर ज़िले में और खेतीहर ज़मीन बेगूसराय ज़िले में पड़ती है.

लिहाजा किसानों को डीजल अनुदान, फसल अनुदान जैसी सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाता है. सड़क, बिजली, संचार सेवा का अभाव तो है ही, विद्यालयों में शिक्षक आना नहीं चाहते हैं.

इतना ही नहीं चुनाव के समय मतदाताओं को काफ़ी परेशानी होती है. ग्रामीण संतोष चौहान की मानें तो चुनाव के समय प्रचार वाहनों का घालमेल कुछ इस तरह हो जाता है कि मतदाता असमंजस की स्थिति में पड़ जाते हैं.

यहां के मतदाताओं को कभी-कभी सरायरंजन और बछवाड़ा विधानसभा क्षेत्र से खड़े उम्मीदवारों के प्रचार के कारण भ्रम पैदा हो जाता है.

किसी चौक पर एक ही पार्टी के दो-दो उम्मीदवार का प्रचार सुन गांव के लोग ये तय नहीं कर पाते हैं कि उनका उम्मीदवार कौन है.

चमथा एसएनएनआर कॉलेज के प्रचार्य अशोक सिंह कहते हैं कि अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों में पड़ने से गांव में आजतक बिजली और दूरभाष सुविधा बहाल नहीं हो पाई है.

इतना ही नहीं बेगूसराय ज़िला मुख्यालय से 55 किलोमीटर दूर बछबाड़ा थाना, प्रखंड और अस्पताल से 18 किलोमीटर की दूरी पर है.

चमाथा के विकास पर भी उल्टा असर पड़ा है

जबकि समस्तीपुर ज़िला मुख्यालय मात्र 35 किलोमीटर और नजदीकी प्रखंड, थाना, अस्पताल और रेलवे स्टेशन मात्र पाँच किलो मीटर के दायरे में आता है.

अगर भाषा संस्कृति को ही देखें तो रहन-सहन मिथिलांचल संस्कृति के कारण यहां के लोगों की मांग वर्षों से समस्तीपुर ज़िले में जोड़ने की रही है.

लेकिन नेताओं की उपेक्षा के कारण आम लोगों की आवाज़ नक्कारखाने में तूती की आवाज़ साबित हुई है. ग्रामीण पप्पू सिंह कहते है कि नेता अपना वोट वैंक के कारण इसमें रुचि नहीं लेते हैं.

चमथा गांव निवासी और बछवाड़ा विधानसभा क्षेत्र से लगातार 10 वर्ष तक विधायक रहे और मौजूदा उम्मीदवार भाकपा नेता अवधेश राय भी मानते हैं कि तीन ज़िलों के तीन विधानसभा और लोकसभा क्षेत्रों में पड़ने से चमथा का समुचित विकास नहीं हो सका है.

विधायक के अनुसार चुनाव में भी कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है.

वे कहते हैं, "चूंकि चमथा गांव जाने का रास्ता एक है, बीच में समस्तीपुर ज़िला होकर जाना पड़ता है, जिससे प्रचार वाहनों के दूसरे क्षेत्रों में प्रवेश कर जाने से मतदाताओं में भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो जाती है. मतदाताओं में भ्रम की स्थिति न हो इसलिए अब तो उस क्षेत्र के प्रचार वाहन पर सवार लोगों को यह बता कर भेजना पड़ता है कि कहां बोलना है और कहां नहीं."

बहरहाल चमथा गांव के लोगों की इस चुनाव में मांग है कि उन्हें समस्तीपुर जिला में शामिल कर दिया जाए.

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