मैला ढोने की प्रथा के ख़िलाफ़ मुहिम

मैला ढोने की प्रथा पर प्रतिबंध के बावजूद ये कई राज्यों में अब भी चल रही है
राष्ट्रीय एकता परिषद ने केंद्र सरकार से एक वर्ष में सफ़ाई कर्मचारियों के मैला ढोने की प्रथा के उन्मूलन करने को कहा है.
इस क्षेत्र में काम कर रहे ग़ैर सरकारी संगठन- सफ़ाई कर्मचारी आंदोलन की ओर से हर्ष मंदेर और अरुणा राय ने इस मामले को राष्ट्रीय एकता परिषद में पेश किया.
सफ़ाई कर्मचारी आंदोलन का कहना है कि इस पर प्रतिबंध के बावजूद ये प्रथा कई राज्यों में अब भी चल रही है.
सफ़ाई कर्मचारी आंदोलन के अध्यक्ष बेजवाडा विल्सन का कहना है, ''ये अच्छी बात है कि आख़िरकार सरकार ने इस मामले को गंभीरता से लिया है और इसके उन्मूलन के संबंध में क़ानून बनने के 17 वर्षों के बाद भी ये प्रथा समाप्त नहीं हो पाई है.''
उनका कहना था कि सरकार को इसके लिए माफ़ी मांगनी चाहिए.
बेजवाडा विल्सन का कहना है कि संगठन के प्रयासों की वजह से पाँच राज्यों- कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, दिल्ली और हरियाणा में ये प्रथा पूरी तरह समाप्त कर दी गई है.
उनका कहना है कि इस संबंध में जल्द ही एक सर्वेक्षण पूरा कर लिया जाएगा ताकि इस कार्य में लोगों को वैकल्पिक रोज़गार मुहैया कराया जा सके.
सफ़ाई कर्मचारी आंदोलम इस मुद्दे पर जागरूकता बढ़ाने के लिए एक बस यात्रा निकाल रहा है जो देश के विभिन्न हिस्सों से होती हुई एक नवंबर को दिल्ली में समाप्त होगी.
ग़ौरतलब है कि शनिवार को सोनिया गांधी की अध्यक्षता में एकता परिषद की बैठक हुई जिसमें भी कहा गया कि ये व्यवस्था पूरी तरह बंद होनी चाहिए और इस कार्य से जुडे लोगों को वैकल्पिक रोजगार मुहैया कराया जाना चाहिए.
उल्लेखनीय है कि देश में आज भी लगभग दस लाख लोग ऐसे हैं जो इंसानी मैला ढोकर गुज़ारा चलाते हैं.
दरअसल आज भी हमारा समाज जाति के आधार पर बँटा हुआ है, अब भी कुछ काम ऐसे हैं जिन्हें सिर्फ़ नीची जाति के कहलाने वाले दलित ही करते हैं, मैला ढोना भी उनमें से एक काम है.
यूं तो सरकार ने 1993 में इस प्रथा को समाप्त करने के लिए क़ानून बनाया था और कई योजनाएँ भी चलाईं लेकिन देश के कई हिस्सों में खुलेआम इस क़ानून की अवेलहना होती है.


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