मेरे भाषण की गलत रिपोर्टिग की गई : करात
करात ने यहां एक बयान में कहा, "कुछ एजेंसियों ने खबर दी है कि मैंने कहा था कि हमने राजनीति व समाज में जाति द्वारा निभाई गई भूमिका को मान्यता न देकर एक ऐतिहासिक भूल की है। एजेंसियों ने यह भी लिखा है कि मैंने कहा था कि कम्युनिस्ट अपने सिद्धांतों और परम्पराओं के लिहाज से 40 के दशक में ही अटके पड़े हैं। मैं इसे स्पष्ट करना चाहता हूं कि इन टिप्पणियों के लिए मुझे जिम्मेदार ठहराना किसी भी रूप में सही नहीं है।"
करात कैम्ब्रिज में विक्टर कीर्नान स्मृति सम्मेलन में दिए अपने व्याख्यान का जिक्र कर रहे थे।
करात ने कहा, "जहां तक जाति का सवाल है, मैंने जो कहा था, वह कुछ इस प्रकार है : 'हमें सैद्धांतिक और व्यावहारिक रूप से यह समझना चाहिए कि भारत में जातीय ढाचा सामंतशाही, भेदभाव और उत्पीड़न से जुड़ा हुआ है और उससे प्रभावित है। यह सामंतशाही, भेदभाव और उत्पीड़न खासतौर से भारतीय समाज में जातीय व्यवस्था में व्याप्त है।' यह कहना कि कम्युनिस्ट भारत के सामाजिक आर्थिक ढाचे में जाति की भूमिका को मानते हैं, एजेंसियों द्वारा मेरे हवाले से जारी किए गए बयान से बिल्कुल भिन्न है।"
करात ने कहा, "एजेंसियों ने दूसरी बात यह फैलाई कि मैंने कहा था कि कम्युनिस्ट 40 के दशक में ही पड़े हुए हैं। लेकिन मैंने जो कहा था वह इस प्रकार है :"
"यहां तक कि आज भी कम्युनिस्ट पार्टी को ज्यादातर समर्थन आंदोलनरत क्षेत्रों और हाशिए पर पड़े क्षेत्रों से मिलते हैं। उन क्षेत्रों में मुख्यरूप से 1941 से 1948 की अवधि में कम्युनिस्ट जन संघर्ष की दो मुख्य ऐतिहासिक धाराओं को एकजुट करने और उनका नेतृत्व करने में सफल हुए थे। यह संघर्ष उपनिवेशी ताकत के खिलाफ था और दूसरा शोषण से मुक्ति के लिए ग्रामीण आम जनता का संघर्ष था। इस तरह जहां भी कम्युनिस्टों ने साम्राज्य विरोधी और जमीदार विरोधी आंदोलनों को संगठित किया और इस संगठित संघर्ष का नेतृत्व किया, वहां उन्हें आम जनता का समर्थन मिला। तेभागा (बंगाल), उत्तर मालबार (केरल), जनजाति आंदोलन (त्रिपुरा) व तेलंगाना आंदोलन इसके कुछ उदाहरण हैं।"
करात ने कहा, "अंत में मैंने कहा था कि कम्युनिस्ट, भूमि सुधार और भूमि के लिए संघर्ष जैसे 40 के दशक के एजेंडे पर आज भी अमल कर रहे हैं।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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