समलैंगिक लड़की का जबरन विवाह

इस साल इस संस्था के पास जो मामले आए हैं उनमें से 29 समलैंगिकों से संबद्ध हैं. ऐसी ही एक लड़की से बीबीसी के रेडियो फ़ाइव लाइव ने बातचीत की. बीस साल की यह लड़की मध्यूपूर्व की है लेकिन उसकी स्कूली शिक्षा ब्रिटेन में ही हुई है. हम आपको उसका नाम नहीं बता पाएँगे लेकिन उसकी आपबीती उसी के शब्दों में आप तक पहुँचा रहे हैं.
"जब मैंने अपना हिजाब उतार कर ज़मीन पर पटका तो मेरे भाई के ग़ुस्से की इंतिहा नहीं रही. ऐसा लग रहा था जैसे यह क़ुरान को जलाने या फाड़ने जैसी कोई घटना हो. मेरी माँ चुपचाप खड़ी थीं. यह भी उनकी उदारता ही थी कि वह मेरी असलियत सुनने को तैयार थीं.
मैंने उन्हें बताया कि मैं लड़कियों को पसंद करती हूँ और उन्हें ही प्यार कर सकती हूँ. मैं अपने घरवालों के धार्मिक और सांस्कृतिक विचारों को अच्छी तरह जानती हूँ और इसीलिए मैंने उनसे सब कुछ सच-सच बताना तय किया. मुझे स्कूल में अंदाज़ा हुआ कि मुझे लड़कियों का चुंबन लेना अच्छा लगता है. मुझे इसमें कोई शर्म महसूस नहीं होती न ही अपराधबोध होता है.
लेकिन मेरे उनसे बात करने का नतीजा यह निकला कि उन्होंने मुझे शादी के लायक़ कुँवारे लड़कों से मिलाना शुरू कर दिया. जब मैं ने इनकार किया तो उन्होंने मुझे पीटा, मेरा हाथ स्टोव पर जलाया. मुझे ऐसी-ऐसी जगह चोटें पहुँचाई कि निशान न दिखने पाएँ क्योंकि मेरी शादी होनी थी और मेरी त्वचा बेदाग़ होनी चाहिए.
मैंने कई बार आत्महत्या की कोशिश की. मेरे लिए मेरा घर एक आश्रय होना चाहिए था न कि कोई ऐसी जगह जहाँ मेरी भावनाओं को कुचला जाए. मैं अब भी स्कूल में ही थी लेकिन मेरे पिता ने एक अन्य देश में एक अजनबी के साथ मेरा रिश्ता कर दिया. मैंने परीक्षा का बहाना बना-बना कर शारीरिक संबंध टाले और अंततः उसने मुझे तलाक़ दे दी.
इसके बाद मेरी परेशानियाँ और बढ़ गईं. मुझे मध्यपूर्व में मेरी दादी के घर भेज दिया गया. मेरे माता-पिता ने यह भी कोशिश की कि मैं ख़ुद अपनी जान ले लूँ. मुझे कमरे में बंद किया गया जहाँ न खाना होता था न पानी. हाँ, वहाँ एक पिस्तौल, चाक़ू, ज़हर की गोलियाँ, पेट्रोल का कनस्तर और माचिस ज़रूर रख दी जाती थी ताकि मैं किसी तरह आत्महत्या करलूँ और वे हत्या के बोझ से बच जाएँ.
मैंने जीने की ठानी और सबका मुक़ाबला करन का मन बनाया. फिर मुझे झाड़फूंक के लिए ले जाया गया जैसे मुझ पर कोई बुरा साया हो. फिर हम वापस लंदन आ गए. लेकिन एक दिन मैंने अपने और अपने पिता के लिए विमान का टिकट देखा और मैं समझ गई कि मुझे फिर शादी के लिए ले जाया जा रहा है.
मैं किसी तरह घर से भाग कर एक सहायता संस्था के दफ़्तर पहुँची. उन्होंने मुझे पुलिस से मिलवाया. पुलिस ने मुझसे कहा कि मैं अपने माता-पिता के यहाँ से अपना सामान ले आऊँ. घर पहुँचने पर मुझे फिर बंद कर दिया गया. उन्होंने दरवाज़ा खोलने से इनकार कर दिया. आख़िरकार पुलिस को दरवाज़ा तोड़ना पड़ा.
मैं अब आज़ाद हूँ. मेरे शरीर के घाव भर जाएँगे लेकिन मन के घाव हमेशा हरे रहेंगे. आपको जन्म देने वाले माता-पिता आपसे कैसे नफ़रत कर सकते हैं? वे कैसे सोच सकते हैं आपका जीना बेकार है"?












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