वैज्ञानिक ज्ञान के विकास में तेजी लाएं : प्रधानमंत्री (लीड-1)

प्रधानमंत्री ने वैज्ञानिक ज्ञान के विकास तथा मौजूदा जरूरतों के मुताबिक इसके अनुप्रयोग को गति देने के लिए नए सिरे से और दृढ़ता के साथ प्रयास करने का विकासशील देशों से आग्रह किया।

हैदराबाद 'एकेडमी ऑफ साइंसेज फॉर डेवलपिंग वर्ल्ड' के 21वें वार्षिक बैठक का उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री ने विकासशील देशों को विज्ञान पर और अधिक ध्यान देने की सलाह दी। एकेडमी ऑफ साइंसेज फॉर डेवलपिंग वर्ल्ड को पहले 'थर्ड वल्र्ड एकेडमी ऑफ साइंसेज' (टीडब्ल्यूएएस) नाम से जाना जाता था।

प्रधानमंत्री ने कहा, "हमें विज्ञान और उसके वैज्ञानिक ढांचे, जैसे कि स्कूल और प्रयोगशालाओं, में निवेश करने की आवश्यकता है। हमें एक ऐसी व्यवस्था को बढ़ावा देने की आवश्यकता है, जिससे रचनात्मकता और उत्कृष्टता पैदा हो सके।"

चार दिवसीय इस सम्मेलन में 60 देशों के 350 से अधिक वैज्ञानिक हिस्सा ले रहे हैं। सम्मेलन में भारत के वैज्ञानिक उपलब्धियों पर विशेष रूप से चर्चा होगी।

विकासशील देशों के बीच एक सुसंगठित तकनीक तथा वैज्ञानिक प्रतिष्ठानों में विशेषज्ञता की कमियों की तरफ इशारा करते हुए मनमोहन सिंह ने कहा कि विकसित देशों के वैज्ञानिक समुदायों को आपसी सहयोग की जरुरत है।

उन्होंने कहा, "हम अकेले किसी समस्या को हल नहीं कर सकते। सभी के एकसाथ मिलकर काम करने से ही किसी समस्या का हल निकलेगा।"

मनमोहन सिंह ने कहा कि विकसित देश लगभग एक तरह की ही समस्याओं का सामना कर रहे हैं चाहे वह घातक बीमारियों का सामना हो, पारंपरिक कृषि की समस्याओं से जूझना हो या फिर प्राकृतिक आपदाओं से निपटने का सवाल हो। इन परेशानियों की तरफ विकसित देशों का ध्यान नहीं जाएगा और न ही हमें उनसे किसी तरह की उम्मीद करनी चाहिए।

मनमोहन सिंह ने कहा कि औद्योगिक देशों द्वारा अपनाया गया विकास का रास्ता मनुष्य के अस्तित्व व जीवन शैली के लिए खतरा पैदा कर सकता है। उन्होंने कहा कि केवल विज्ञान ही विकासशील समाज एवं अर्थव्यवस्थाओं को एक वैकल्पिक एवं अधिक टिकाऊ रास्ता प्रदान कर सकता है, वह भी धरती मां के प्राकृतिक उपहारों को क्षतिग्रस्त एवं नष्ट किए बगैर।

उन्होंने कहा, "यदि हम इस तरह का कोई रास्ता पा सकते हैं, जो विकास की बुनियादी चुनौतियों के साथ त्वरित एवं प्रभावी रूप से निपटने में हमारी क्षमता को अनावश्यक रूप से कमजोर न करता हो, तो हमें अपने प्रबुद्ध स्वार्थ में इसका अनुसरण करना चाहिए।"

मनमोहन सिंह ने कहा कि जलवायु परिवर्तन के सबसे अधिक विनाशकारी प्रभाव विकसित देशों में ही है। इस क्षेत्र की समस्याओं से निदान की वैज्ञानिक प्रक्रियाएं विकसित देशों के वैज्ञानिकों के पास ही हैं। उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में विकासशील देशों को एक साथ मिलकर जोरदार ढंग से आवाज उठाए जाने की आवश्यकता है।

सिंह ने कहा, "सरकारों के रूप में हम विकासशील देशों की नीतियों में अधिक से अधिक तालमेल और एकरूपता लाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन इन प्रयासों को ठोस तकनीकी ज्ञान के समर्थन की जरूरत है।"

उन्होंने कहा कि 'एकेडमी ऑफ साइंसेस फॉर द डेवलिंग वर्ल्ड' ऐसा अवसर उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है, जहां जलवायु परिवर्तन जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर वैज्ञानिक सहयोग की सुविधा उपलब्ध कराई जा सकती है।

मनमोहन सिंह ने बौद्धिक संपदा अधिकारों के आदान-प्रदान के मुद्दे को सुलझाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि यह कभी-कभी अपेक्षाकृत तात्कालिक व्यावसायिक अनुप्रयोगों के साथ अनुसंधान पर सहयोग में व्यवधान पैदा करता है।

प्रधानमंत्री ने कहा कि विकासशील दुनिया के सामने खड़ी चुनौतियों पर दक्षिण-दक्षिण सहयोग का भारत एक मजबूत पैरोकार रहा है। भारत-ब्राजील-दक्षिण अफ्रीका फोरम, तीन विभिन्न द्वीपों के तीन प्रमुख लोकतंत्रों के बीच सहयोग का एक अनोखा खाका मुहैया कराता है।

इस मौके पर विज्ञान राज्य मंत्री पृथ्वीराज चव्हाण, आंध्र प्रदेश के राज्यपाल ई.एस.एल.नरसिम्हन और मुख्यमंत्री के.रोसैया भी मौजूद थे।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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