'परमाणु ऊर्जा का मतलब 100 साल की प्रतिबद्धता'

चेन्नई, 19 अक्टूबर (आईएएनएस)। अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि 60 से अधिक देशों ने अपनी ऊर्जा जरूरतें पूरी करने के लिए परमाणु ऊर्जा में इच्छा दिखाई थी लेकिन अब तक इसमें से सिर्फ एक तिहाई देश ही ऐसा कर सके हैं।

आईएईए के उप महानिदेशक युरी सोकोलोव ने आईएएनएस को दिए साक्षात्कार में कहा, "परमाणु ऊर्जा आज के समय में ऊर्जा के किसी अन्य विकल्प की तरह नहीं है। परमाणु ऊर्जा का सीधा मतलब 100 साल की प्रतिबद्धता है। परमाणु ऊर्जा का विकल्प चुनते समय किसी भी देश को इससे जुड़े अंतर्राष्ट्रीय उत्तरदायित्वों को समझना चाहिए। संभव है कि आगे 20 से 25 देश परमाणु ऊर्जा का उत्पादन करें।"

एशिया में इन दिनों 35 परमाणु रिएक्टरों का निर्माण जारी है। बांग्लादेश, इंडोनेशिया, जोर्डन, मलेशिया, फिलीपींस, संयुक्त अरब अमीरात, सिंगापुर, थाईलैंड और वियतनाम जैसे एशियाई देशों के पास कोई परमाणु रिएक्टर नहीं है। ऐसे में ये देश अब परमाणु कार्यक्रम आरंभ कर रहे हैं।

सोकोलोव ने कहा, "विभिन्न देशों के पास ऊर्जा की अलग-अलग जरूरते हैं। उन्हें अपने यहां परमाणु ऊर्जा की भूमिका को समझना चाहिए। उन्हें परमाणु तकनीक और इससे जुड़े सभी पहलुओं को भी सही ढंग से समझना होगा।"

उन्होंने कहा कि परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में विस्तार का केंद्र एशिया है। वर्ष 2009 में कुल 12 नए संयंत्रों का निर्माण शुरू हुआ, उनमें 10 अकेले एशिया में बनाए जा रहे हैं। एशिया में फिलहाल 40 रिक्टरों का निर्माण कार्य चल रहा है।

सोकोलोव ने कहा, "परमाणु ऊर्जा का रास्ता अपनाने वाले नए देशों को यह समझना होगा कि उनके अंतर्राष्ट्रीय उत्तरदायित्व क्या हैं।"

चीन द्वारा पाकिस्तान को रिएक्टर बेचने पर भारत की आपत्तियों के सवाल पर सोकोलोव ने कहा, "इसमें कुछ नया नहीं है। दोनों देश जानते हैं कि वे क्या कर रहे हैं और इससे जुड़ी अंतर्राष्ट्रीय जिम्मदारियां किस तरह की हैं।"

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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