घर नहीं लौटना चाहते पाकिस्तान के बाढ़ प्रभावित
समाचार पत्र 'द न्यूज इंटरनेशनल' के मुताबिक ये लोग इस विस्थापन को एक आशीर्वाद की तरह देख रहे हैं, इस विस्थापन ने उन्हें आदिवासी जीवन प्रणाली के बंधनों से मुक्ति दी है।
शिकारपुर जिले के सैफल नसीरानी के 65 वर्षीय बेटे उस्मान कहते हैं कि लोग निराश हो गए हैं और अपने पिछले जीवन से नाता तोड़ लेना चाहते हैं।
उन्होंने अपने परिवारों को असुरक्षित बताते हुए कहा कि लोगों की दशा बहुत दुखद है। उन्होंने कहा, "आदिवासी अदालत हमारी लड़कियों और लड़कों का भविष्य तय करती हैं। कोई यह पूछने की भी हिम्मत नहीं कर सकता कि बच्चों की हत्या क्यों की गई।"
'पाकिस्तान इंस्टीट्यूट ऑफ लेबर एजुकेशन एंड रिसर्च' (पीआईएलईआर) एनजीओ ने विभिन्न राहत शिविरों में विस्थापित परिवारों के साथ सामूहिक चर्चा की थी, जिससे स्पष्ट हुआ कि घर वापसी के मुद्दे पर अलग-अलग लोगों के अलग-अलग विचार हैं।
एनजीओ ने अपने सर्वेक्षण में पाया कि जिन लोगों की उनके गृह नगर में जमीनें हैं वे तो घर वापसी चाहते हैं लेकिन जो अपना सब कुछ गंवा चुके उनकी लौटने की कोई इच्छा नहीं है।
बाढ़ प्रभावितों में ज्यादातर भूमिहीन किसान हैं और वे सिंध खासकर हैदराबाद और कराची के शहरी केंद्रों में ही रुकना चाहते हैं और चाहते हैं कि सरकार उनकी परेशानी को सहानुभूतिपूर्ण ढंग से समझे।
पाकिस्तान में इस साल आई बाढ़ में 1,700 लोग मारे गए थे और करीब दो करोड़ लोग विस्थापित हुए थे।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


Click it and Unblock the Notifications