खाद्यान्न सड़ने को लेकर सर्वोच्च न्यायालय चिंतित

नई दिल्ली, 18 अक्टूबर (आईएएनएस)। देश में भंडारण की समुचित व्यवस्था न होने के कारण बड़ी मात्रा में खाद्यान्न के सड़ने और उसके मनुष्य के खाने लायक न रह जाने को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार को चिंता जताई।

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति दलवीर भंडारी और न्यायमूर्ति दीपक वर्मा की पीठ ने सोमवार को कहा, "खाद्यान्न का नुकसान इतनी बड़ी मात्रा में हुआ है कि हम उसका अंदाजा लगा पाने में अक्षम हैं। यह बहुत बड़ी मात्रा है। आपने यह मात्रा 7,000 टन बताई है। यदि इतनी भी मात्रा है, तो भी यह बहुत अधिक है।"

सर्वोच्च न्यायालय ने यह टिप्पणी तब की, जब अतिरिक्त महाधिवक्ता (एएसजी) मोहन पारासरन ने पीपुल्स युनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) के उस तर्क का विरोध किया जिसमें उसने कहा था कि वर्ष 2008-2009 में पंजाब और हरियाणा में 67,539 टन खाद्यान्न सड़ गए।

एएसजी ने कहा कि इन दोनों राज्यों में वास्तव में 7,000 टन अनाज सड़े थे।

न्यायमूर्ति भंडारी ने कहा, "जितना आपने नुकसान कर दिया, वह तो गया, लेकिन अभी जो नुकसान होने वाला है कम से कम उसे तो गरीबों को उपलब्ध कराया जा सकता है।"

अदालत ने हालांकि स्पष्ट किया कि वह यह सलाह नहीं दे रहा है कि सड़ा हुआ खाद्यान्न वितरित कर दिया जाए।

केंद्र सरकार ने अदालत से कहा कि गरीबी रेखा से (बीपीएल) नीचे रहने वाले प्रत्येक परिवार को 35 किलोग्राम खाद्यान्न देने की व्यवस्था पर राज्यों के साथ कोई विवाद नहीं है, लेकिन बीपीएल परिवारों की पहचान के मानदंड को लेकर मतभेद है।

पीयूसीएल की ओर से पेश होते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंजाल्वेस ने कहा कि बीपीएल परिवारों की संख्या केंद्र सरकार द्वारा दिए गए आंकड़े से बहुत अधिक है। इस पर पारासरन ने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा दिया गया आंकड़ा गरीबी के नए आंकड़े पर आधारित है और 2009 की जनसंख्या में बीपीएल परिवारों की संख्या 5.90 करोड़ बताई गई है। यह संख्या योजना के तहत लिए गए 6.52 करोड़ परिवारों से कम है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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