वोट बैंक की राजनीति के लिए भगवा आतंकवाद शब्द का इस्तेमाल : भागवत (लीड-1)
विजया दशमी के अवसर पर संघ के वार्षिक समारोह को सम्बोधित करते हुए भागवत ने कहा, "पंथ, प्रांत, भाषा की हमारी विविधताओं को आपस में लड़ाकर मत बटोरने वाले यही कुछ लोग, एक तरफ मुख से 'सेक्युलरिज्म' का जयकार लगाकर, बड़ी-बड़ी गोलमटोल बातें करते हुए सामाजिक सद्भाव को बिगाड़ने का षडयंत्र रच रहे हैं और सामाजिक सद्भाव बनाए रखने के प्रयत्नों में बाधा डालते रहते हैं।"
उन्होंने कहा कि इसी उद्देश्य के चलते कुछ आतंकी घटनाओं में कुछ हिन्दू व्यक्तियों की तथाकथित संलिप्तता को लेकर 'हिन्दू आतंकवाद' और 'भगवा आतंकवाद' जैसे शब्दों का प्रयोग प्रचलित करने का देशघाती षड्यंत्र रचा जा रहा है।
उन्होंने कहा, "इसमें संघ को भी गलत नीयत से घसीटने का दुष्ट प्रयास हो रहा है। असत्य के मायाजाल में जनता को भ्रमित करने तथा हिन्दू संगठनों को बदनाम करने की यह कुचेष्टा किनके इशारे पर चल रही है व किनको लाभान्वित कर रही है इसको जानने का हमने प्रयत्न नहीं किया है। परंतु यह किसी को लाभान्वित करने के स्थान पर अपने राष्ट्र को अपकीर्ति व आपत्ति में डालेगी यह निश्चित है।"
भागवत ने कहा, "अयोध्या मामले में अकारण ही संपूर्ण समाज की समरसता में विभेद का विष व संघर्ष की कटुता पैदा हुई। इस विवाद को समाप्त कर राम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर बनाने के लिए हम सभी को बीती बातें भूलकर एकत्र होना चाहिए। अदालत का निर्णय राम जन्मभूमि पर एक भव्य मंदिर के निर्माण का ही मार्ग प्रशस्त करेगा।"
उन्होंने कहा, "यह निर्णय अपने देश के मुसलमानों सहित सभी वर्गो को आत्मीयतापूर्वक मिलजुलकर नया शुभारम्भ करने का नियति द्वारा प्रदत्त अवसर है। अपनी संकीर्ण मानसिकता, पूर्वाग्रहों से ग्रसित हठ तथा संशय की भावना को छोड़कर हमें श्रीराम का मंदिर जन्मभूमि पर बनाने के लिए एकत्रित होना चाहिए। यही संपूर्ण समाज की इच्छा है। 30 सितंबर के निर्णय के पश्चात समाज ने जिस एकता व संयम का परिचय दिया, वह इसी इच्छा को दर्शाता है।"
जम्मू एवं कश्मीर की मौजूदा परिस्थिति का जिक्र करते हुए भागवत ने कहा कि स्वायत्तता की मांग करने वाले अलगाववादी समूहों से वार्ता करना और उन्हें प्रश्रय देना कश्मीर समस्या को सुलझाने की बजाए उलझाएगा, इसलिए केंद्र सरकार को कश्मीर घाटी के साथ-साथ जम्मू एवं लद्दाख के साथ बरसों से चले आ रहे भेदभाव के बारे में भी गंभीरता से विचार करना होगा।
भागवत ने कहा, "कश्मीर में ताजा संकट गंभीर व जटिलतर बन गया है। भारत सरकार को अलगाववादी तत्वों द्वारा कराए गए प्रायोजित पथराव के आगे झुकना नहीं चाहिए। सेना के बंकर्स हटाने से व उसके अधिकार कम करने से वहां भारत की एकात्मता व अखण्डता की रक्षा नहीं होगी। वर्ष 1994 में संसद में सर्वसम्मित से पारित प्रस्ताव में व्यक्त संकल्प ही अपनी नीति की दिशा होनी चाहिए। यह सदैव स्मरण रखना है कि महाराजा हरिसिंह के द्वारा हस्ताक्षरित विलयपत्र के अनुसार कश्मीर का भारत में विलीनीकरण अंतिम व अपरिवर्तनीय है।"
चीन को आड़े हाथों लेते हुए भागवत ने कहा कि चीन के समर्थन से नेपाल में माओवादियों का उपद्रव खड़ा हुआ व बड़ा हुआ। नेपाल के उन माओवादियों का अपने देश के नक्सली आतंक के साथ भी संबंध है। कहीं-कहीं तो इस समस्या का भी अपने राजनीतिक स्वार्थो के लिए साधन के रूप में उपयोग किया जा रहा है। देश की सुरक्षा व प्रजातंत्र के लिए यह बात बहुत महंगी पडेगी।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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