कर्नाटक में भाजपा सरकार ने दूसरी बार बहुमत साबित किया (राउंडअप)

सदन में बहुमत साबित करने के लिए 105 मतों की जरूरत थी। राज्यपाल हंसराज भारद्वाज ने बुधवार को मुख्यमंत्री को दूसरा मौका देते हुए 14 अक्टूबर तक विधानसभा में फिर से बहुमत साबित करने के लिए कहा था।

विधानसभा अध्यक्ष के. जी. बोपैया ने जैसे ही कहा कि मत विभाजन के मुताबिक 106 सदस्यों ने विश्वास प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया वहीं 100 सदस्यों ने इसके विरोध में अपना मत व्यक्त किया है, वैसे ही भाजपा सदस्य खुशी से झूम उठे और जीत का जश्न मनाने लगे।

भाजपा के मनप्पा विज्जल और जनता दल (सेक्युलर) के एम. सी. अश्वथ ने विश्वास मत का बहिष्कार किया। भाजपा ने विज्जल को अयोग्य ठहराए जाने के लिए विधानसभा अध्यक्ष से दरख्वास्त की है। भाजपा को निर्दलीय सदस्य वार्थुर प्रकाश और मनोनित सदस्य डेरेक फुलिनफॉ का मत मिला।

विश्वास मत हासिल करने के बाद येदियुरप्पा ने संवाददाताओं से बातचीत में कहा, "चार दिनों के अंतराल में मैंने दूसरी बार बहुमत साबित किया है। पहली बार सोमवार को ध्वनि मत से और दूसरी बार आज मतदान के जरिए। कानून के मुताबिक छह महीने के भीतर दूसरी बार बहुमत साबित करने का कोई प्रावधान नहीं है। लेकिन राज्यपाल के निर्देश को मानते हुए मैंने इतिहास रच दिया है।"

येदियुरप्पा सरकार के बहुमत साबित करने के बाद अब निगाहें उच्च न्यायालय के फैसले पर टिकी हैं। यदि अदालत ने पांचों निर्दलीय विधायकों की अयोग्यता के खिलाफ फैसला दे दिया तो इस सरकार का भविष्य अधर मे लटक जाएगा। निर्दलीय विधायकों की याचिका पर 18 अक्टूबर को सुनवाई होनी है।

बहरहाल, भाजपा ने दावा किया कि यदि उच्च न्यायालय अयोग्य करार दिए गए पांच निर्दलीय विधायकों के हक में फैसला सुनाता है और उन्हें मतदान की अनुमति देता है तो भी वहां की भाजपा सरकार पर काई आंच नहीं आएगी।

भाजपा प्रवक्ता राजीव प्रताप रूड़ी ने नई दिल्ली में संवाददाताओं से बातचीत में कहा कि गुरुवार को हुए मतदान में दो विधायकों ने हिस्सा नहीं लिया। इनमें से एक भाजपा का था और दूसरा जनता दल (सेक्यूलर) का। दोनों विधायकों की अनुपस्थिति से विधानसभा सदस्यों की कुल प्रभावी संख्या 208 की बजाए 206 हो गई।

उन्होंने कहा कि अदालत यदि निर्दलीय विधायकों को मतदान की अनुमति दे भी देता है यह संख्या 211 हो जाएगी। ऐसी स्थिति में बहुमत के लिए 106 सदस्यों की जरूरत होती है और भाजपा के पास 106 विधायकों को समर्थन है। इसमें यदि विधानसभा अध्यक्ष के वोट को जोड़ लिया जाए तो सरकार के पास बहुमत के लिए जरूरी संख्या में एक और इजाफा हो जाएगा।

गौरतलब है कि कर्नाटक विधानसभा में कुल 225 सदस्य हैं। इसमें एक सदस्य मनोनित है। सोमवार को विधानसभा अध्यक्ष के. जी. बोपैया ने विश्वास प्रस्ताव पर मतदान से पहले 16 बागी विधायकों को दल-बदल कानून के तहत अयोग्य करार दिया था। इनमें से 11 भाजपा के थे और पांच निर्दलीय। बाद में इन विधायकों ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था।

विश्वास मत से राज्य के दो प्रमुख विपक्षी दलों कांग्रेस और जनता दल (सेक्युलर) ने विश्वास मत के बहिष्कार की धमकी दी थी हालांकि बाद में दोनों ने मतदान में हिस्सा लिया। विधानसभा में कांग्रेस के 73 और जनता दल (सेक्युलर) के 28 सदस्य हैं।

मतदान से कुछ देर पहले कांग्रेस विधायकों की एक बैठक हुई जिसके बाद विश्वास मत प्रस्ताव का बहिष्कार करने की बजाय इसके विरोध में मतदान करने का फैसला हुआ। पार्टी की प्रदेश इकाई के कार्यकारी अध्यक्ष डी. के. शिवकुमार ने संवाददाताओं से कहा, "हमने बहिष्कार का अपना फैसले बदलते हुए सत्र में हिस्सा लेने का निर्णय लिया ताकि सदन में हम अपने पक्ष को रख सकें।"

कांग्रेस ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा है कि अयोग्य ठहराए गए विधायकों के मामले में उच्च न्यायालय के फैसले पर सब कुछ निर्भर है।

पार्टी प्रवक्ता मनीष तिवारी ने दिल्ली में संवाददाताओं से कहा, "इस मामले में उच्च न्यायालय के फैसले पर ही सब कुछ निर्भर करता है।

न्यायालय 18 अक्टूबर को सुनवाई करेगा। तिवारी ने आरोप लगाया कि कर्नाटक में भाजपा की सरकार ने भ्रष्टाचार और संस्थागत रूढ़ीवाद को बढ़ावा दिया है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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