अलगाववादियों ने मौलानाओं से कहा, सलाह की जरूरत नहीं
अलगाववादी नेताओं ने घाटी में अत्याचारों और हत्याओं के लिए सुरक्षा बलों की निंदा करने वाले भारतीय मुसलमानों की प्रशंसा करते हुए मौलानाओं से कहा कि उन्हें कश्मीर की आजादी के आंदोलन में दखल नहीं देना चाहिए।
अलगाववादियों की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है, जब एक दिन पहले ही दारुल उलूम देवबंद और जमीयत-ए-उलेमा-ए-हिंद (जेयूएच) ने जम्मू एवं कश्मीर से सशस्त्र सेना विशेष शक्तियां अधिनियम (एएफएसपीए) जैसे क्रूर कानून को हटाए जाने की मांग की थी।
इन धार्मिक संगठनों ने सुझाव दिया था कि भारत का एक मात्र मुस्लिम बाहुल्य राज्य जम्मू एवं कश्मीर, देश का एक अभिन्न अंग है और कश्मीरियों की मांगें भारतीय संविधान के दायरे में पूरी की जानी चाहिए।
दारुल उलूम देवबंद सुन्नी इस्लाम का धार्मिक मुख्यालय है, जबकि जेयूएच इसका प्रभावी सामाजिक मंच है।
जम्मू एवं कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) के अध्यक्ष मुहम्मद यासीन मलिक ने आईएएनएस से कहा, "आजादी चाहने वाले कश्मीरी लोगों पर किए गए अत्याचार के खिलाफ भारतीय मुसलमानों द्वारा जाहिर की गई चिंता को मैं सलाम करता हूं।"
मलिक ने कहा, "लेकिन इसके साथ ही मैं भारतीय मुसलमानों से अपील करूंगा कि कश्मीर के राजनीतिक मुद्दे का समाधान वे प्रस्तुत न करें। मैं इस संबंध में उनकी सीमाओं को बखूबी समझता हूं।"
नरमपंथी हुर्रियत धड़े के अध्यक्ष मीरवाइज उमर फारुख ने कहा, "भारतीय मुसलमानों की खुद अपनी सीमाएं हैं। फिर भी उन्होंने अत्याचारों, ज्यादतियों और एएफएसपीए के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की है।"
मीरवाइज ने कहा, "हम इसका स्वागत करते हैं। हम उनसे यह उम्मीद नहीं करते कि वे हमारे आजादी के आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल होंगे। उन्होंने भारतीय संविधान के दायरे में समस्या के समाधान की बात कही है, जो कि हमारे रुख से मेल नहीं खाता।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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