हमेशा आम पर सही निशाना लगाती थीं दीपिका

दीपिका की मां गीता महतो ने आईएएनएस को बताया, "उसे अपने उद्देश्य के बारे में शायद ही याद होगा, जब वह पत्थर मार कर आम गिरा देती थी।" महतो को अपनी बेटी पर गर्व है।

महतो ने कहा, "शुरू में हमें दीपिका को तीरंदाजी के उपकरण और अन्य सुविधाएं मुहैया कराने में दिक्कत होती थी। हम अपने खर्च में कटौती कर उसकी जरूरतों को पूरा करते थे। लेकिन हमें उसकी दृढ़ता के बारे में पता था कि वह एक दिन जरूर अपने सपने को हासिल करेगी।"

दीपिका एक अच्छे घर में पैदा हुईं, जो हमेशा उसकी मदद करने के लिए त्याग करता रहा है और कभी भी उसके विश्व तीरंदाज बनने के रास्ते में नहीं आया। शुरू में वह बांस से बने तीर और धनुष से अभ्यास करती थीं।

दीपिका को पहला अवसर 2005 में उस समय मिला जब उनका दाखिला अर्जुन तीरंदाजी अकादमी में हुआ था। जिसे मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने सरायकेला-खरसावा जिले में बनवाया है।

इसके बाद दीपिका ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। वह वर्ष 2006 में जमेशदपुर में स्थित टाटा तीरंदाजी अकादमी से जुड़ गईं। जहां उन्हें सही उपकरण, प्रशिक्षण, एक पोशाक और एक कमरा मिला। लेकिन इसके लिए दीपिका को हर महीने 500 रुपये देने पड़ते थे।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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