उभरती अर्थव्यवस्थाओं को उचित प्रतिनिधित्व मिले: प्रणब मुखर्जी
वाशिंगटन, 10 अक्टूबर (आईएएनएस)। भारत ने उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों के बढ़ते महत्व के अनुरूप इन्हें वैश्विक आर्थिक प्रशासन तंत्र में ज्यादा हिस्सेदारी देने की मांग की है।
अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) और विश्व बैंक की बैठक में शनिवार को केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने कहा, "मुद्रा कोष की भूमिका का विस्तार पूरी तरह से कोटा व्यवस्था में सुधार पर निर्भर है। यह संगठन प्रशासनिक तंत्र में बदलाव और मतभार के हस्तांतरण के बिना प्रभावी और विश्वसनीय नहीं हो सकता।"
कुल 187 देशों के वित्तीय संस्थानों की प्रतिनिधि समितियों की बैठक में मुखर्जी ने कहा, "यदि निदेशक मंडल और बोर्ड ऑफ गवर्नर में बदलते विश्व की वास्तविकताओं को प्रतिविंबित नहीं किया गया तो आईएमएफ की वैधता पर सवाल खड़े होंगे।"
मुखर्जी ने कहा, "कम मांग की अवस्था वाली मौजूदा वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत जैसे देश ही मांग पैदा कर रहे हैं और वैश्विक अर्थव्यवस्था के सुधार में योगदान कर रहे हैं।"
उन्होंने कहा, "विभाजन पैदा करने वाला सबसे बड़ा मुद्दा यह है कि उभरती अर्थव्यवस्थाओं और विकासशील देशों को कम से कम 5 प्रतिशत मतभार हस्तांतरित कौन से देश करेंगे। विकसित देशों को इस जिम्मेदारी का वहन करना होगा।"
मुखर्जी ने सुझाव दिया, "कोष की प्रभावशीलता बढ़ाने के लिए इसमें प्रशासकीय सुधार के लिए रचनात्मक बातचीत होनी चाहिए। नई सहायक संस्थाएं बनाने पर बातचीत करना अपर्याप्त होगा।"
इससे पहले योजना सत्र को संबोधित करते हुए मुखर्जी ने कहा, "बुरा दौर गुजर गया है लेकिन अनिश्चितता का समय अभी जारी है।"
उन्होंने कहा, "सुधार और पुननिर्माण के इस दौर में हमें नाजुक हालतों को लेकर सतर्क रहना चाहिए। इस आर्थिक संकट के दौरान सामने आई अंतर्राष्ट्रीय समन्वय की चुनौतियों को दूर करना होगा।"
उन्होंने कहा, "अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय एवं मौद्रिक संरचना में कोष की भूमिका को देखते हुए हमें इसे संगठनात्मक और प्रशासकीय सुधारों के जरिए बेहतर बनाना चाहिए ताकि बदलते विश्व में अपनी जिम्मेदारियों को निभाने के लिए यह प्रासंगिक, वैध और प्रभावी रहे।"
मुखर्जी ने कहा, "हमें विश्वास है कि हम सामूहिक प्रयासों के चलते वैश्विक वित्तीय तंत्र की स्थिरता और संतुलित एवं स्थाई विकास सुनिश्चित कर सकते हैं।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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