चीन के बागी लिउ जियाओबो को नोबेल शांति पुरस्कार (लीड-2)
नार्वे की नोबेल पुरस्कार समिति के अध्यक्ष थोर्बजोर्न जगलैंड ने कहा, "चीन में लम्बे समय से मानवाधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे लिउ को सर्वसम्मति से इसके लिए चुना गया है।"
उन्होंने कहा कि समिति का मानना है कि लिउ का मानवाधिकारों और शांति से गहरा जुड़ाव रहा है।
लिउ ने एक समय चेकगणराज्य में लिखे गए 'नागरिक घोषणा पत्र-77' की तरह ही अपने देश में भी 'नागरिक घोषणा पत्र-08' को लिखा था।
गौरततब है कि 54 वर्षीय जियाओबो को सत्ता पलटने को शह देने के आरोपों के कारण 11 साल कारावास की सजा मिली हुई है।
जगलैंड ने पत्रकारों से कहा, "चीनी सरकार ने कई अंतर्राष्ट्रीय समझौतों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सहित अपने संवैधानिक व असेंबली की आजादी का उल्लंघन किया है।"
नोबेल शांति पुरस्कार के लिए लिउ के नाम का समर्थन अन्य पुरस्कार विजेताओं जैसे कि दक्षिण अफ्रीका के डेसमंड टूटू और तिब्बती धार्मिक नेता दलाई लामा ने भी किया था।
पुरस्कार के रूप में 15 लाख डॉलर लिउ को ओस्लो में दो दिसम्बर को प्रदान किए जाएंगे।
उधर, चीन के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता ने कहा कि लिउ को पुरस्कार दिया जाना, शांति के नोबेल पुरस्कार के उद्देश्य को नकारना है।
नोबेल पुरस्कार समिति के एक अधिकारी ने बताया कि चीन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने चेतावनी दी थी कि अगर लिउ को पुरस्कार दिया गया तो, दोनों देशों के बीच सम्बंधों पर असर पड़ेगा।
पेरिस में अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन एवं शोध केंद्र के ज्यां फिलिप बेजा ने कहा, "चीन में लिउ के संघर्ष छेड़ने को लेकर कभी सवाल नहीं खड़ा किया गया। हालांकि वर्ष 1989 में उनका छात्र आंदोलन बेहद महत्वपूर्ण रहा।"
उन्होंने कहा, "लिउ एक ऐसे व्यक्ति हैं,जो सच्चाई के साथ जीवित रहना चाहते हैं।"
रिपोर्ट में बताया गया है कि यह नामुमकिन है कि लिउ को नोबेल पुरस्कार जीतने के सम्बंध में जानकारी न मिली हो।
लिउ के वकील ने शांति के नोबेल पुरस्कार के लिए उनके नाम भेजे जाने की उन्हें जानकारी दी थी।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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