बिहार चुनाव में परिवारवाद का बोलबाला
स्थिति यहां तक पहुंच गई कि पुत्रों, पत्नियों और भाईयों की तो बात छोड़ दी जाए दल किसी बड़े नेता के दूर के रिश्तेदारों को भी टिकट देने से पार्टियों ने गुरेज नहीं किया। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने जनता दल (युनाइटेड) के सांसद सुशील कुमार सिंह के भाई सुनील सिंह को औरंगाबाद विधानसभा क्षेत्र से अपना प्रत्याशी बनाया है तो घोसी के सांसद जगदीश षर्मा के पुत्र राहुल शर्मा इस चुनाव में जद (यु) की ओर से चुनावी मैदान मं नजर आएंगे। वर्तमान समय में उनकी मां शांति शर्मा वहां की विधायक हैं।
सुपौल के सांसद विश्व मोहन कुमार अपनी पत्नी सुजात देवी को पिपरा विधानसभा के लिए जद (यु) के टिकट दिलाने में सफल हुए तो पूर्व केन्द्रीय मंत्री स्वर्गीय डुमरलाल बैठा के भांजे हरि प्रसाद रानीगंज से कांग्रेस के लिए चुनाव मैदान में वोट मांगते नजर आयेंगे।
लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) से इस्तीफा देकर जद (यु) के टिकट पर समस्तीपुर से सांसद बने महेश्वर हजारी के पिता रामसेवक हजारी कल्याणपुर विधानसभा से जद (यु) के लिए चुनाव मैदान में हैं तो जद (यु) की सहयोगी पार्टी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने महेश्वर हजारी के भाभी मंजू हजारी को रोसड़ा से तथा उनके एक अन्य रिश्तेदार शशिभूषण हजारी को कुशेश्वरस्थान से टिकट थमा दिया है। रामसेवक हजारी लोजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामविलास पासवान के नजदीकी रिश्तेदार हैं।
आजीवन कारावास की सजा भुगत रहे विधायक मुन्ना शुक्ला की पत्नी अन्नु शुक्ला लालगंज के चुनावी दंगल में हैं तो जद (यु) से नाता तोड़कर राजद में गये पूर्व सांसद प्रभुनाथ सिंह के समधी विनय सिंह भाजपा से सोनपुर से प्रत्याशी बनाये गए हैं।
राजद के सांसद जगदानन्द सिंह के पुत्र सुधाकर सिंह को भाजपा ने रामगढ़ से टिकट थमाया है तो जद (यु) के सांसद महाबली सिंह के पुत्र धर्मेन्द्र कुमार लालटेन थाम चैनपुर से चुनावी मैदान संभाल लिया है। राजद के ही सांसद एवं पूर्व मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह के भाई महनार से कांग्रेस के प्रत्याशी हैं तो पूर्व सांसद तस्लीमुद्दीन के पुत्र सरफराज जोकीहाट से भाग्य आजमाएंगे।
पूर्व सांसद पप्पू यादव की पत्नी रंजीता रंजन बिहारीगंज से तो पूर्व सांसद आनंद मोहन की पत्नी लवली आनंद आलमनगर से कांग्रेस का झंडा बुलंद कर रही हैं। इसके अलावा भी कई ऐसे नेता चुनाव मैदान में अपने भाग्य आजमाते नजर आ रहे हैं जो बड़े नेताओं के रिश्तेदार हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का भी मानना है कि यही प्रमुख कारण है कि आज सभी राजनीतिक दलों को अपने ही कार्यकर्ताओं के बागी तेवर का सामना करना पड़ रहा है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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