अमेरिकी संरक्षणवाद के खिलाफ भारत का समर्थन करेगा जर्मनी
ज्ञानेंद्र कुमार केसरी
नई दिल्ली, 2 अक्टूबर (आईएएनएस)। पिछले कुछ महीनों में अमेरिका द्वारा अपनाई गई संरक्षणवादी नीतियों के खिलाफ जर्मनी जी-20 की प्रस्तावित सियोल बैठक सहित सभी मंचों पर भारत के रुख का समर्थन करेगा।
भारत में जर्मनी के राजदूत थामस मातुसेक ने आईएएनएस से कहा, "संरक्षणवाद एक जहर है। यह किसी भी देश के लिए ठीक नहीं है। हम भारत के साथ हैं और जी-20 एवं अन्य मंचों पर भारत के रुख का समर्थन करेंगे।"
उन्होंने कहा कि जर्मनी अमेरिका में हाल ही में हुए बदलावों को लेकर काफी संशय की स्थिति में है। इन बदलावों से अमेरिका व्यापार में बाधाएं खड़ी कर रहा है।
मातुसेक ने कहा, "मध्यम और लंबी अवधि के नजरिए से देखें तो यह अमेरिका के हित में नहीं है। यह एक जहर है जो अमेरिकी अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाएगा। हम इस तरह के किसी भी कदम के खिलाफ हैं।"
उन्होंने कहा कि अमेरिका ने यह कदम मतदाताओं के एक वर्ग को लुभाने और लोकप्रियता प्राप्त करने के लिए उठाए हैं।
पिछले कुछ महीनों में अमेरिका ने कामों की आउटसोर्सिग बंद करने के लिए कई नीतिगत कदम उठाए हैं। इसमें वीजा फीस में वृद्धि शामिल है, इससे भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी कम्पनियों को प्रतिवर्ष 25 करोड़ डॉलर का नुकसान होगा। अमेरिका ने एच -1बी वीजा पर शुल्क 2000 डॉलर और एल-1ए वीजा पर 2,250 डॉलर बढ़ा दिया है।
इसके अलावा अमेरिका के ओहायो प्रांत ने आउसोर्सिंग पर पाबंदी लगा दी है।
भारत ने इस कदम को 'प्रतिबंधात्मक और संरक्षणवादी करार देते हुए कहा कि इससे भारतीय आउटसोर्सिग कंपनियों के व्यापार पर प्रतिकूल असर पड़ेगा और इसकी वजह से वैश्विक अर्थव्यवस्था के पटरी पर लौटने की प्रक्रिया में बाधा में उत्पन्न हो सकती है।
वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने हाल ही में कहा था कि भारत इस मुद्दे को सियोल में 11 और 12 नवंबर को होने वाले जी20 शिखर सम्मेलन में उठाएगा।
संयुक्त राष्ट्र में जर्मनी के प्रमुख के रूप में कार्य कर चुके मातुसेक ने कहा कि भारत और जर्मनी अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था और राजनीतिक ढांचे में संरचनात्मक सुधार के लिए मिलकर काम करेगा।
मातुसेक ने कहा, "भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्था को अंतर्राष्ट्रीय संगठनों में बड़ी भूमिका मिलनी चाहिए। आखिर भारत के बिना दक्षिण एशिया की चर्चा कैसे की जा सकती है। इसलिए हमारा मानना है कि भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्य होना चाहिए। "
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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