गीतकार शहरयार और कुरुप को ज्ञानपीठ पुरस्कार (लीड-1)

नई दिल्ली/तिरुवनंतपुरम, 24 सितम्बर (आईएएनएस)। भारतीय ज्ञानपीठ ने शुक्रवार को 43वें और 44वें ज्ञानपीठ पुरस्कारों की एक साथ घोषणा की। ये पुरस्कार उर्दू के जाने-माने साहित्यकार शहरयार और मलयालम कवि नीलकानंदन वेलु कुरुप को दिए जाएंगे। भारतीय साहित्य जगत में यह सबसे बड़ा पुरस्कार है।

ज्ञानपीठ की ओर से जारी विज्ञप्ति के अनुसार ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता सीताकांत महापात्र की अध्यक्षता में चयन समिति की बैठक में यह निर्णय लिया गया। चयन समिति के अन्य सदस्य प्रो. मैनेजर पाण्डेय, डा. के.सच्चिदानंदन, प्रो. गोपीचंद नारंग, गुरदयाल सिंह, केशुभाई देसाई, दिनेश मिश्रा और रवींद्र कालिया बैठक में मौजूद थे।

वर्ष 2008 के लिए 44वें ज्ञानपीठ पुरस्कार पाने वाले उर्दू शायर शहरयार का जन्म उत्तर प्रदेश के जिला बरेली के आंवला में 6 जून, 1936 को हुआ था। कुंवर अखलाक मोहम्मद खां ही बाद में शहरयार के नाम से जाने गए। इनकी प्ररंभिक शिक्षा हरदोई में हुई। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से इन्होंने 1961 में उर्दू में एम.ए. किया। यहीं इन्होंने अध्यापन भी किया। मशहूर शायर और उपन्यासकार राही मासूम रजा इनके सहपाठी थे।

फिल्म गमन, आहिस्ता-आहिस्ता और उमराव जान के गीतों ने शहरयार को विशेष पहचान दिलाई। वह उर्दू के चौथे साहित्यकार हैं, जिन्हें यह सम्मान दिया जाएगा। इससे पहले फिराक गोरखपुरी, कुर्रतुल-ऐन-हैदर और अली सरदार जाफरी को इस पुरस्कार से नवाजा जा चुका है।

शहरयार का नाम हिंदी और उर्दू साहित्य में जाना-पहचाना नाम है। उन्होंने कई सदाबहार गीत लिखे जैसे 'इन आंखों की मस्ती में पैमाने हजारों हैं..', 'दिल चीज क्या है आप मेरी जान लीजिए.. ' और 'सीने में जलन आंखों में तूफान सा क्यों है..' शामिल हैं।

वर्ष 2007 के 43वें ज्ञानपीठ पुरस्कार के लिए लिए चयनित मलयालम कवि ओ.एन.पी. कुरुप का जन्म 27 मई, 1931 को केरल के कोल्लम जिला अंर्तगत चावारा में हुआ था। 79 वर्षीय कुरुप मलयालम फिल्मों के लिए गीत लिखने के बाद काफी लोकप्रिय हुए। उनकी पहली कविता 'मुन्नोट्टु'एक साप्ताहिक पत्रिका में 1946 में प्रकशित हुई, इसके बाद उन्होंने फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

अर्थशास्त्र में स्नातक और मलयालम साहित्य में स्तातकोत्तर की डिग्री हासिल कर चुके कुरुप ने कहा, "मलयालम को लंबे अंतराल के बाद यह पुरस्कार मिला है। यह मलयालम कविता का सम्मान है।"

यह सम्मान पाने वाले कुरुप मलयालम के दूसरे कवि हैं। इससे पहले कवि जी. शंकर कुरुप को ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला था।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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