अंग्रेजी के आगे कब तक लाचार रहेगी हिंदी! (हिंदी दिवस 14 सितम्बर पर विशेष)

सन् 1950 में 14 सितम्बर को भारत के संविधान में हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया गया। तब से प्रत्येक वर्ष इस भाषा के संवर्धन के लिए हिंदी दिवस, हिंदी सप्ताह और हिंदी पखवाड़ा तक मनाया जाता है। आयोजनों में हिंदी के प्रचार-प्रसार और हिंदी में कामकाज करने का संकल्प लिया जाता है लेकिन यह धरा ही रह जाता है। वजह स्पष्ट है कि यह सब सच्ची निष्ठा से नहीं, बल्कि दिखावे के लिए किए जाते हैं।

इस बार भी सभाएं, समारोह, हिंदी लेखन स्पर्धा, वाद-विवाद प्रतियोगिताएं होंगी, अंग्रेजी की गुलाम मानसिकता से बाहर निकलने का प्रण लिया जाएगा। भले ही इसका प्रतिफल कुछ न मिले, लेकिन कार्यक्रम तो होने ही हैं और होंगे। गौर करने की बात है कि हिंदी के अलावा किसी भाषा का दिवस नहीं मनाया जाता है। यह भी एक संयोग है कि हिंदी दिवस का आगमन श्राद्ध पक्ष के आसपास ही होता है। क्या इससे नहीं लगता कि हम हिंदी का ही 'श्राद्ध' मना रहे हैं?

देखा जाए तो हिंदी की दशा हमारे देश के कर्णधारों की विफलता का जीता-जागता नमूना है, क्योंकि भारत के संविधान के भाग 17 अनुच्छेद 343 (1) में स्पष्ट लिखा है कि संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी। इतने स्पष्ट निर्देशों के बाद भी आज अंग्रेजी पूरे देश में इतनी हावी है कि उसके सामने हिंदी लाचार नजर आती है। इसके लिए हम भले ही लार्ड मैकाले की शिक्षा पद्धति को दोष देते रहें, पर सच तो यह है कि इतने शिक्षाशास्त्रियों के इस देश में अभी तक ऐसी शिक्षा नीति नहीं बन पाई, जिससे देश के नागरिकों को अपनी भाषा में पढ़ने की छूट मिल सके। दूसरी ओर, विदेशों में हिंदी भाषा की लोकप्रियता बढ़ रही है।

पहला विश्व हिंदी सम्मेलन नागपुर में सन् 1975 में हुआ था। इसके बाद यह सम्मेलन विश्व के कई स्थानों पर आयोजित हुआ। दूसरा सम्मेलन मॉरीशस में सन् 1976 में, तीसरा भारत में सन् 1983 में, चौथा ट्रिनिडाड और टोबैगो में सन् 1996 में, पांचवां लंदन में 1999 में, छठा सूरीनाम में 2003 में और सातवां सम्मेलन अमेरिका में सन् 2007 में हुआ था।

हिंदी भाषा से जुड़े कुछ रोचक तथ्य भी हैं, मसलन हिंदी भाषा का इतिहास सबसे पहले एक फ्रांसीसी लेखक ग्रासिन द तैसी ने लिखा था। हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओं पर पहला विस्तृत सर्वेक्षण एक अंग्रेज जॉर्ज अब्राहम ग्रीयर्सन ने किया। इसी तरह हिंदी भाषा पर पहला शोध कार्य 'द थियोलॉजी ऑफ तुलसीदास' को लंदन विश्वविद्यालय में पहली बार एक अंग्रेज विद्वान जे.आर. कार्पेटर ने प्रस्तुत किया था।

यह सच है कि वर्तमान अंग्रेजी केंद्रित शिक्षा प्रणाली से हम समाज के सबसे बड़े तबके को अपनी भाषा में ज्ञान देने से वंचित कर रहे हैं। उनमें अपनी भाषा के प्रति हीन भावना पैदा कर रहे हैं। यही समय है कि हम गुलामी की मानसिकता से उबरें और अपनी राष्ट्रभाषा को उचित सम्मान दें।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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