झोपड़-पट्टियाँ: पुनर्वास, भष्ट्राचार और क़ानून कार्रवाई

झोपड़-पट्टियाँ: पुनर्वास, भष्ट्राचार और क़ानून कार्रवाई

विनीत खरे

बीबीसी संवाददाता, मुंबई

मुंबई पुलिस का भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो लगभग दो साल पहले झुग्गी-झोंपड़ी में रहने वालों के पुनर्वास के लिए बनी स्लम रिहैबिलिटेशन अथॉरिटी (एसआरए) पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की छानबीन कर रहा था.

उसी समय मुंबई हाईकोर्ट के एक फ़ैसले ने सभी को स्तब्ध कर दिया. फ़ैसला था कि सभी मामलों को एक उच्च स्तरीय समिति के हवाले कर दिया जाए.

भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बीबीसी को बताया कि हाईकोर्ट का फ़ैसले से अनेक लोगों को हैरानी हुई. यही नहीं, इससे एसआरए से परेशान लोगों में निराशा फैल गई.

सवाल उठे कि जाँच का काम पुलिस का होता है, न कि उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों का.

कई बार उनके अधीन काम कर रहे एसआरए अधिकारियों, पुलिस अफ़सरों, और म्हाडा (महाराष्ट्र हाउज़िंग ऐंड एरिया डेवलपमेंट एथॉरिटी) के लोगों के खिलाफ़ शिकायतें होती हैं. क्या ये संभव है कि ये उच्च अधिकारी अपने ही अधिकारियों के खिलाफ़ कार्रवाई कर पाएँगे?

ब्यूरो ने समिति को 86 मामले स्थानांतरित किए थे.

इस समिति में म्हाडा (महाराष्ट्र हाउज़िंग ऐंड एरिया डेवलपमेंट एथॉरिटी) के सीईओ गौतम चटर्जी, प्रमुख सचिव (हाउज़िंग) सीताराम कुंटे, अतिरिक्त पुलिस कमिश्नर देवेन भारती और एसआरए के सीईओ एसएस ज़ेंडे भी शामिल हैं.

ये एक अर्द्ध-न्यायिक समिति है और इसका काम है शिकायत की शुरुआती जाँच करना.

अब सवाल ये उठता है कि उन 86 मामलों का क्या हुआ जो इस समिति के पास थे? ज़ेंडे के मुताबिक समिति ने उनकी प्रारंभिक जाँच ही की है.

समझना मुश्किल नहीं कि जिनके मकानों पर दो साल में मात्र प्रारंभिक जाँच भर हुई है वो कहाँ जाएँगे?

सामाजिक कार्यकर्त्ता राज अवस्थी कमेटी की कारगुज़ारी से संतुष्ट नहीं हैं. शेख पटेल से हमारी मुलाकात बांद्रा पूर्व स्थित एसआरए दफ़्तर में हुई.

वो धारावी में एसआरए स्कीम से जुड़ी शिकायत को लेकर दो बार समिति के सामने पेश हुए, लेकिन निराश हैं. आरोप लगाते हैं कि समिति में बिल्डर लॉबी का दख़ल होता है.

डॉक्टर राम आसरे यादव कोंकड़ीपाड़ा, मलाड ईस्ट, में रहते हैं और पिछले तीन साल से दफ़्तर के चक्कर लगा रहे हैं. वो कहते हैं, "सिक्योरिटी वाले उन्हें बाहर से ही भगा देते हैं. उनके मुताबिक एसआरए के तहत उन्हें जो घर मिला वहाँ जानवर भी नहीं रह सकता. न तो वहाँ बिजली है, न पानी."

समिति की हर महीने दो बैठकें होती हैं. इसके पास करीब 1,300 मामले लंबित हैं. यानि, लोग परेशान हैं.

लेकिन अगर एसआरए के पूर्व प्रमुख और म्हाडा के सीईओ और वाइस प्रेसिडेंट गौतम चैटर्जी की मानें तो झोपड़पट्टी वालों और बिल्डरों की सांठगाँठ भी समस्या के लिए ज़िम्मेदार है.

एसआरए दफ़्तर से थोड़ी ही दूर पर भारत नगर नाम का इलाका है. यहाँ अब ज़मीन मानो सोना उगलने लगी है. यहाँ कुछ लोगों को झोपड़ियाँ खाली करने के एक-एक करोड़ रुपए तक मिले हैं.

सामाजिक कार्यकर्ता राज अवस्थी बताते हैं, "भारत नगर की ज़मीन म्हाडा की थी. नियमों के मुताबिक यहाँ एसआरए स्कीम लागू नहीं हो सकती थी, लेकिन ऐसा ही हुआ. नियमों को ज़रूरत के मुताबिक बदला गया क्योंकि बिल्डर इस ज़मीन को हथियाना चाहते थे. शुरुआत में लोग कुछ लाख में ही मान गए, लेकिन आखिर में करीब 40 लोग ऐसे थे जिन्हें अपने झोपड़े खाली करने के एक करोड़ रुपए तक मिले."

उनका कहना है कि दरअसल, वहाँ के एक बिल्डर पर गुजरात के एक बेहद प्रभावशाली दूसरे बिल्डर के लिए ज़मीन खाली करवाने का दबाव भी था.

जब ज़ेंडे से हमने भारत नगर के बारे में पूछा, तो उन्होंने बस इतना कहा कि भारत नगर का मामला एक अपवाद है.

ज़ेंडे मानते हैं कि लोगों को मुफ़्त घर देने की योजना राजनीतिक मजबूरियों की वजह से लागू की गई थी और झोपड़पट्टी में रहने वालों को घर का कम से कम 40-50 प्रतिशत खर्चा वहन करना चाहिए, नहीं तो इस योजना का जारी रह पाना मुश्किल है.

मुंबई में करीब 2,200 झोपड़पट्टियों वाली जगहे हैं. चूंकि ये योजना सरकारी पैसे पर नहीं बल्कि बाज़ार के भरोसे है इसलिए बिल्डर सिर्फ़ मुनाफ़े वाली जगहों पर पैसा लगाना चाहते हैं.

जेंड़े के मुताबिक भांडुप, दहीसर और कांदीवली उत्तर जैसे उपनगरों में एसआरए योजना का अकाल है.

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