आग उगलता रहा मानसून सत्र

सांसदों का वेतन भत्ता भी बढ़ गया लेकिन इसके लिए सत्तापक्ष के सांसद भी साथ थे. महंगाई के मुद्दे पर कार्य स्थगन प्रस्ताव की मांग कर रहे विपक्ष ने कई दिनों कर संसद में हंगामा किया. हालांकि लोकसभा और राज्यसभा में भारी हंगामे के बावजूद सरकार इस मांग को खारिज कराने में कामयाब हो गई.
इस पूरी कवायद में संसद की कार्रवाई कई दिनों तक ठप्प रही. जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर सरकार से दो टूक जवाब मांग रहे विपक्ष को इस मुद्दे पर भी कुछ हाथ नहीं लगा और उसकी तमाम कोशिशों के बावजूद गृहमंत्री पी चिदंबरम ने इस मुद्दे पर संसद में कोई सफ़ाई नहीं दी.
सरकार की एक बड़ी जीत रही परमाणु दायित्व विधेयक. विपक्ष को साथ लेकर सरकार संसद में ये विधेयक पारित कराने में कामयाब रही.राष्ट्रीय जनता दल और समाजवादी पार्टी जैसे प्रमुख दलों के विरोध के बावजूद भारतीय जनता पार्टी के समर्थन के बल पर सरकार ने अपनी मुश्किलें आसान कर लीं.
भोपाल गैस त्रासदी मामले में आरोपियों को दो साल कैद की सज़ा सुनाए जाने के बाद संसद में बहस इस बात पर टिकी रही कि हादसे के लिए ज़िम्मेदार यूनियन कार्बाइड के प्रमुख वॉरेन एंडरसन को भारत से बाहर जाने की इजाज़त किसने दी.
सत्र में इस मसले पर हुई बहस में भोपाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री और संसदीय मंत्री रहे अर्जुन सिंह ने अपनी चुप्पी तोड़ी और एंडरसन को भारत से बाहर भेजने का दारोमदार तत्कालीन गृहमंत्री पी वी नरसिम्हा राव पर डाल दिया.
गैर कानूनी खनन का मामला भी राजनीतिक हो-हल्ले के बीच दब कर रह गया. कर्नाटक में सरकार की नाक के नीचे हो रहे गैर कानूनी खनन को लेकर विरोध के स्वर संसद तक पहुंचे लेकिन इस मामले पर भी बहस का कोई नतीजा नहीं निकला. सांसदों के लिए ये सत्र एक बड़ी खुशखबरी लेकर आया.
सांसदों के वेतन और भत्ते संबंधी विधेयक को सर्वसम्मति से पारित कर दिया गया जिसके तहत सांसदों का वेतन 16000 से बढ़ाकर 50,000 कर दिया गया है. वेतन के अलावा मिलने वाले भत्तों में भी बढ़ोत्तरी की गई है.
सत्र के आख़िर में पेश हुए 'शत्रु संपत्ति संशोधन विधेयक 2010' को फ़िलहाल स्थगित कर दिया गया है. इस विधेयक पर संसद के शीतकालीन सत्र में चर्चा कराई जाएगी.
संसदीय मामलों पर अनुसंधान करने वाली संस्था पीआरएस लेजिस्लेटिव ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि मानसून सत्र के दौरान राज्यसभा और लोकसभा के 100 से ज़्यादा सांसदों ने किसी बहस में हिस्सा नहीं लिया. इन सांसदों की हिस्सेदारी न बहस में रही न ही इन्होंने किसी मसले पर संसद में सवाल-जवाब किए.












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