भारतीय साहित्यकार को पाकिस्तान का सम्मान

भारतीय साहित्यकार को पाकिस्तान का सम्मान

मिर्ज़ा एबी बेग

बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए, दिल्ली से

उर्दू के मशहूर साहित्यकार, आलोचक और उपन्यासकार शमसुर्रहमान फ़ारूक़ी को पाकिस्तान ने सितारा-ए-इम्तियाज़ देने की घोषणा की है.

उल्लेखनीय है कि ये पाकिस्तान का तीसरा प्रमुख सम्मान माना जाता है.

इलाहाबाद में रहने वाले 85 वर्षीय साहित्यकार शमसुर्रहमान फ़ारूक़ी ने बताया कि पाकिस्तान सरकार ने इस बारे में उनसे संपर्क किया है.

इस सम्मान की घोषणा पाकिस्तान के स्वतंत्रता दिवस के मौक़े पर की गई और उन्हें ये सम्मान पाकिस्तान दिवस के मौक़े पर दिया जाएगा.

पाकिस्तान दिवस 23 मार्च को मनाया जाता है.

बीबीसी से बातचीत में शमसुर्रहमान ने कहा कि सितारा-ए-इम्तियाज़ मिलना उनके लिए बड़े सम्मान की बात है.

उन्होंने कहा, "ये सम्मान उसी वक़्त मिला जब अपने देश ने मुझे सम्मानित किया और अंतरराष्ट्रीय पहचान बनाने में मदद की."

बहरहाल, उन्होंने भारत और पाकिस्तान के साहित्यकारों और साहित्यप्रेमियों का इसका श्रेय दिया.

शमसुर्रहमान फ़ारूक़ी को 2009 में पद्मश्री से सम्मानित किया जा चुका है. उन्हें प्रतिष्ठित सरस्वती सम्मान भी मिल चुका है.

उन्होंने कहा कि वे सितारा-ए-इम्तियाज़ दिए जाने को भारत-पाकिस्तान के बीच दोस्ती के रूप में देखते हैं. उन्होंने कहा, "पाकिस्तान की ओर से ये दोस्ती की अच्छी पहल है जो आगे भी जारी रहेगी."

उनसे जब पूछा गया कि पिछले दिनों भारतीय संसद में उर्दू की ख़राब स्थिति पर हंगामा हुआ था ऐसे में ये सम्मान क्या मायने रखता है तो उन्होंने कहा, "भारत में उर्दू की स्थिति वैसी नहीं रही है जैसी बयान की जाती है. उर्दू एक लोकप्रिय भाषा है और हर जगह उसका इस्तेमाल हो रहा है."

उन्होंने ये भी कहा, "ये अलग बात है कि लोग अपने मफ़ाद के लिए इसका अलग-अलग तरह से इस्तेमाल करते हैं."

उन्होंने मिसाल देते हुए कहा कि केरला में मलयालम भाषा के अंतरराष्ट्रीय स्तर के आयोजन का उदघाटन उनसे कराया गया था हालांकि उस भाषा या इलाक़ो का उर्दू से कोई लेना-देना नहीं है. और ये उर्दू की लोकप्रियता की दलील है.

शमसुर्रहमान फ़ारूक़ी का जन्म 1935 ई में पूर्वी उत्तर प्रदेश में हुआ और उन्हें उर्दू में आधुनिकतावादी आंदोलन के अग्रणी लोगों में माना जाता है. उन्होंने उर्दू में आलोचना के नए आयाम दिए हैं. उन्होंने 'शबख़ून' नामक एक पत्रिका निकाली और उसके ज़रिए अपना साहित्यिक आंदोलन चलाया.

उनसे जब पूछा गया कि क्या ये सम्मान किसी और भारतीय को मिला है तो उन्होंने कहा, "जहां तक मुझे मालूम है ये सम्मान पहले किसी भारतीय को नहीं मिला है, इक़बाल सदी के सिलसिले में तीन भारतीयों को इक़बाल मेडल दिया गया था और ये अवार्ड प्रोफ़ेसर आले अहमद सुरूर, जगन्नाथ आज़ाद और गोपीचंद नारंग को दिया गया था."

उन्होंने आगे कहा, "लेकिन पाकिस्तान का सबसे बड़ा सिविल अवार्ड निशान-ए-पाकिस्तान भारत ही नहीं बल्कि पूरे दक्षिण एशिया और दुनिया की मशहूर हस्ती दिलीप कुमार को दिया जा चुका है."

शमसुर्रहमान फ़ारूक़ी की सबसे प्रसिद्ध कृति उर्दू के सुप्रसिद्ध शायर मीर तक़ी मीर के कलाम पर लिखी उनकी आलोचना है जो 'शेर-शोर-अंगेज़' के नाम से तीन भागों में प्रकाशित हुई है.

उनकी किताबों में शेर, ग़ैर शेर, और नस्र (1973), गंजे-सोख़्ता (कविता संग्रह), स्वार और दूसरे अफ़साने (फ़िक्शन) कई चांद थे सरे-आसमां (उपन्यास) और जदीदियत कल और आज (2007) शामिल हैं.

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