नक्सलियों के संघर्ष विराम के प्रस्ताव पर मिश्रित प्रतिक्रियाएं (राउंडअप)
कोलकाता/नई दिल्ली/हैदराबाद, 18 अगस्त (आईएएनएस)। सरकार के साथ शांति वार्ता आरंभ करने के लिए नक्सलियों द्वारा पेश किए गए तीन महीने के संघर्ष विराम के प्रस्ताव पर मिश्रित प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। रेल मंत्री ममता बनर्जी, सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निेवश तथा क्रांतिकारी लेखक वरवर राव ने जहां इस प्रस्ताव का स्वागत किया है और सरकार से सकारात्मक कदम उठाए जाने का आग्रह किया है, वहीं कुछ सुरक्षा विशेषज्ञों ने इस प्रस्ताव को नक्सलियों का ढकोसला बताया है।
अग्निवेश ने आईएएनएस से फोन पर कहा, "भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के पोलित ब्यूरो सदस्य किशनजी का यह एक बेबाक फैसला है।"
केंद्र सरकार पर नक्सलियों के प्रवक्ता चेरुकुरी राजकुमार उर्फ आजाद की दो जुलाई को हत्या का आरोप लगाने वाले अग्निेवश ने कहा कि मंगलवार को दिए गए तीन महीने के संघर्ष विराम के प्रस्ताव पर नक्सली अधिकारियों से सीधा जवाब चाहते हैं।
उन्होंने कहा कि इसके बाद भाकपा (माओवादी) के एक पोलित ब्यूरो सदस्य को संघर्ष विराम शुरू करने की तिथि बतानी चाहिए। सरकार को भी उस तिथि से 72 घंटे का युद्धविराम घोषित करना चाहिए।
कुछ महीने पहले तक मरते दम तक लड़ने का संकल्प जताने वाले किशनजी के एक आडियो टेप के माध्यम से मीडिया को शांति वार्ता और तीन महीने के संघर्ष विराम के लिए नक्सलियों के तैयार होने की जानकारी देने के एक दिन बाद अग्निवेश की टिप्पणी सामने आई है।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से नक्सलियों को वार्ता के लिए कहने के दो दिन बाद नक्सलियों का यह प्रस्ताव सामने आया।
नक्सलियों ने वार्ता में मध्यस्थ के तौर पर अग्निवेश या रेल मंत्री ममता बनर्जी के नाम का प्रस्ताव किया है।
बनर्जी ने भी नक्सलियों के इस प्रस्ताव का स्वागत करते हुए कहा है कि उन्हें इस बात की खुशी है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील द्वारा बातचीत के लिए आगे आने हेतु किए गए आह्वान पर नक्सलियों ने सकारात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त की है।
केंद्रीय गृह मंत्री पी.चिदम्बरम पहले ही अग्निवेश को मध्यस्थ की भूमिका निभाने को कह चुके हैं।
दूसरी ओर सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञों का कहना है कि नक्सली नेता किशनजी का संघर्ष विराम का प्रस्ताव ढकोसले से ज्यादा कुछ नहीं है। जानकारों का कहना है कि सरकार को नक्सलियों के 'वार्ता जाल' में नहीं फंसना चाहिए।
नक्सली मुद्दों के जानकार और स्तंभ लेखक अनिल विभाकर ने कहा, "किशनजी के मंगलवार को दिए गए प्रस्ताव में कुछ नया नहीं है। यह एक आम प्रस्ताव की तरह है। मुझे नहीं लगता कि कोई इसे गंभीरता से ले रहा है। नक्सली हमेशा वार्ता के समय को नए हमलों की तैयारी के लिए उपयोग करते हैं। मुझे लगता है सरकार बेवकूफ नहीं बनेगी।"
छत्तीसगढ़ में आतंकवाद निरोधी कार्रवाई के विशेषज्ञ और सुरक्षा बलों को गुरिल्ला हमलों से निपटने का प्रशिक्षण देने वाले एक विशेषज्ञ ने कहा, "भाकपा (माओवादी) हिंसा में विश्वास रखने वाला संगठन है। यह विचारधारा के बारे में भ्रम फैलाकर बंदूक के बल पर ताकत हथियाने वाला संगठन है। किशनजी का तीन महीने के संघर्ष विराम का प्रस्ताव पूरी तरह ढकोसला है।"
छत्तीसगढ़ सरकार ने हालांकि नक्सलियों के इस प्रस्ताव पर कोई टिप्पणी करने से इंकार कर दिया, लेकिन पुलिस मुख्यालय में एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, "यह नक्सलियों का पुराना तरीका है कि वह सरकार को वार्ता में मशगूल करके खुद को सुरक्षा बलों के शिकंजे से मुक्त कराते हैं और अपने संगठन को नए युद्ध के लिए मजबूत बना लेते हैं।"
दूसरी ओर किशनजी के प्रस्ताव पर केंद्र सरकार ने तात्कालिक प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि नक्सलियों को पहले हिंसा बंद करनी होगी।
नई दिल्ली में गृह सचिव जी. के. पिल्लै ने आईएएनएस से कहा, "यह महत्वपूर्ण नहीं है कि किशनजी ने क्या कहा। इसमें (संघर्ष विराम) किसी की कोई रुचि नहीं है।"
पिल्लै ने कहा, "उन्होंने ऐसा कहा, क्योंकि वह ऐसा चाहते हैं। हमारा रुख स्पष्ट है। बातचीत से पहले उन्हें हिंसा बंद करनी होगी।"
नक्सलियों से सहानुभूति रखने वाले लेखक, वरवर राव ने पिल्लै की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए हैदराबाद में बुधवार को कहा कि सरकार नक्सलियों के साथ बातचीत के प्रति गंभीर नहीं है। उन्होंने कहा कि केवल संघर्ष विराम ही बातचीत का रास्ता तैयार कर सकता है।
राव ने आईएएनएस से कहा, "वार्ता के पहले नक्सली हिंसा त्याग दें, इस तरह की बात से कुछ भी हासिल नहीं होने वाला। सरकार संघर्ष विराम की बात नहीं कर रही, इससे लगता है कि वह गंभीर नहीं है।"
राव चाहते हैं कि कांग्रेस नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार आंध्र प्रदेश की अपनी सरकार का अनुसरण करे, जिसने 2004 में नक्सलियों के साथ बातचीत के लिए आठ महीने के संघर्ष विराम की घोषणा की थी।
राव ने आंध्र प्रदेश में नक्सलियों और सरकार के बीच हुई शांति वार्ता में मध्यस्थता की थी। उन्होंने कहा, "हिंसा त्यागने की बात बकवास शर्त है। नक्सलियों की नजर में राज्य हिंसा में लिप्त है और हिंसा के सभी उपकरण राज्य के हाथों में ही हैं। नक्सली जो कर रहे हैं वह प्रतिकार और क्रांतिकारी हिंसा है।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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